थोक भाव में ‘टूट’: जब जनमत से ज़्यादा ‘जमानत’ प्यारी हो जाए!

जगदीश पोरवाल (जनसंदेश)

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नया ‘थोक बाज़ार’ खुला है, जहाँ खुदरा (एक-दो) विधायकों या सांसदों की नहीं, बल्कि सीधे दो-तिहाई की ‘सूटकेस डील’ होती है। कार्टून इसी कड़वी और हास्यास्पद सच्चाई पर सटीक चोट करता है।

लीक’ बनाम ‘टूट’: असली खतरा कहाँ है?

कार्टून में एक तरफ नेताजी देश के युवाओं की चिंता करते हुए “पेपर लीक बंद हो” का बोर्ड थामे खड़े हैं। लेकिन बगल वाले चतुर राजनीतिज्ञ उन्हें कड़वा व्यावहारिक ज्ञान दे रहे हैं—“लीक-वीक छोड़ो, ‘टूट’ की सावधानी रखना!” व्यंग्य साफ है: देश के युवाओं का भविष्य लीक हो जाए, तो नेताओं की कुर्सी को कोई खतरा नहीं होता। लेकिन अगर अपनी ही पार्टी के दो-तिहाई सांसद ‘लीक’ होकर दूसरी तरफ चले गए, तो सीधे राजनीतिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। आज के दौर में नेताओं के लिए परीक्षा के पेपर की सुरक्षा से कहीं अधिक जरूरी अपनी पार्टी की ‘दीवारों’ की सुरक्षा करना हो गया है।

दलबदल कानून: जब ‘ढाल’ ही ‘हथियार’ बन जाए

जिस दलबदल कानून को पार्टियां तोड़ने से बचने के लिए बनाया गया था, आज के शातिर राजनेताओं ने उसका तोड़ निकाल लिया है। अब नेता ‘अकेले’ पाला नहीं बदलते (क्योंकि सदस्यता जाने का डर रहता है), बल्कि वे पूरे ‘ग्रुप डिस्काउंट’ के साथ दो-तिहाई का आंकड़ा पार करके जाते हैं। कानून भी हैरान है कि जिसे रोकने के लिए नियम बनाया था, अब उसी नियम के तहत थोक में दलबदल को ‘वैध’ और ‘नैतिक’ मानकर अलग गुट की मान्यता दे दी जाती है।

डर’ और ‘दम घुटने’ का कॉकटेल

आजकल क्षेत्रीय या पारिवारिक पार्टियों के सांसद और विधायक अचानक एक सुबह जागते हैं और उन्हें महसूस होता है कि पार्टी में उनका ‘दम घुट’ रहा था। लेकिन इस ‘दम घुटने’ की क्रोनोलॉजी बड़ी दिलचस्प है—जैसे ही केंद्रीय जांच एजेंसियों की फाइलें खुलती हैं या जांच की आंच करीब आती है, वैसे ही नेताओं का ‘दम’ ज्यादा तेजी से घुटने लगता है।
परिणामस्वरूप, अपनी राजनीतिक और व्यक्तिगत ‘जमानत’ बचाने के लिए नेता ‘शरणम गच्छामि’ का मार्ग चुन लेते हैं। विचारधाराएं तो मानो मौसम के पूर्वानुमान की तरह हो गई हैं, जो सत्ता की हवा देखकर रातों-रात बदल जाती हैं।

जनता बेचारी पांच साल में एक बार धूप में लाइन लगाकर ‘मतदान’ करती है, लेकिन नेताजी पांच मिनट में अपनी ‘निष्ठा’ बदल लेते हैं। कार्टूनिस्ट अशोक ने यह दिखाकर आईना थाम दिया है कि आज की राजनीति में जनहित के बड़े-बड़े मुद्दे सिर्फ ‘दिखाने वाले तख्त’ (बोर्ड) हैं, असली खेल तो पीछे अपनी ‘टूट’ को रोकने और सत्ता की मलाई का हिस्सा बने रहने का है।

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