आचार नहीं, ‘सेवा’ संहिता लागू है साहब!”

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निकाय-पंचायत चुनाव फिर टल सकते, जनता को मिला 30 दिन का ‘सेवा पैकेज’

जगदीश पोरवाल (जनसंदेश)

राजस्थान में निकाय और पंचायत चुनावों की राह देख रही जनता को फिलहाल लोकतंत्र नहीं, बल्कि “सेवा” का प्रसाद परोसा जा रहा है। चुनावी आचार संहिता की चर्चा तो दूर, सरकार और प्रशासन ने पहले ही साफ संकेत दे दिए हैं कि अभी वोट नहीं, बल्कि “शिविर” चलेंगे।

कार्टूनिस्ट अशोक के ताजा कार्टून में यही दर्द और व्यंग्य बड़ी खूबसूरती से उभरकर सामने आया है। एक आम नागरिक चिंता जताता है कि 31 जुलाई तक चुनाव कराने का कोई विचार दिखाई नहीं दे रहा, तो दूसरा जवाब देता है कि भाई साहब, आचार संहिता नहीं, “सेवा संहिता” लागू कर दी गई है।

दरअसल, प्रदेशभर में 15 जून से 15 जुलाई तक 30 दिन का शहरी सेवा शिविर आयोजित किया जा रहा है। सुबह 9:30 बजे से शाम 6 बजे तक यानी प्रतिदिन 8 घंटे 30 मिनट प्रशासन जनता की समस्याएं सुनने और समाधान का दावा करने में व्यस्त रहेगा।

अब थोड़ा गणित समझिए

सेवा शिविर : 15 जून से 15 जुलाई (30 दिन)
चुनाव की कोई संभावना नहीं : 31 जुलाई तक
शिविर समाप्ति के बाद भी : 16 दिन का अतिरिक्त इंतजार
यानी जनता को संदेश साफ है कि फिलहाल मतदाता नहीं, लाभार्थी बनिए। वोट की पर्ची बाद में आएगी, आवेदन पत्र अभी भरिए।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जब चुनाव नजदीक आते हैं तो आमतौर पर “आचार संहिता” लागू होती है, जिससे नई घोषणाओं और योजनाओं पर रोक लग जाती है। लेकिन इस बार तस्वीर उल्टी दिखाई दे रही है। पहले योजनाओं और शिविरों की झड़ी लगा दी गई है, ताकि चुनावी माहौल बनने से पहले “सेवा” का पूरा हिसाब जनता तक पहुंचाया जा सके।

कार्टून का सबसे तीखा संदेश यही है कि लोकतंत्र की घड़ी फिलहाल रोककर प्रशासनिक गतिविधियों का अलार्म बजा दिया गया है। जनता चुनाव की तारीख पूछ रही है और जवाब में उसे शिविर की तारीखें सुनाई जा रही हैं।

व्यंग्य यही कहता है कि—

“जब चुनाव दूर हों तो सेवा शिविर आते हैं,
और जब चुनाव पास आते हैं तो सेवा के आंकड़े गिनाए जाते हैं।”

अब देखना यह है कि प्रदेश में पहले ‘सेवा संहिता’ समाप्त होती है या फिर जनता का चुनावी इंतजार। फिलहाल तो लोकतंत्र की घड़ी 31 जुलाई के बाद की तारीख देखने को मजबूर नजर आ रही है।

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