जनप्रतिनिधियों से टूटा आस-भरोसा, अब प्रशासन ही ‘सहारा’: भवानीमंडी उपखंड कार्यालय पर ज्ञापन देने आते पीड़ित

जनसंदेश ( जगदीश पोरवाल )

भवानीमंडी। लोकतंत्र में जनता अपने वार्ड, गांव और नगर के विकास के लिए जनप्रतिनिधियों को चुनती है, लेकिन जब वही चुने हुए नुमाइंदे जनता की सुध लेना भूल जाएं, तो आम आदमी का सिस्टम से भरोसा उठना लाजमी है। भवानीमंडी उपखंड क्षेत्र में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। गांव, मोहल्ले और वार्डों में सड़क, नाली, बिजली, अतिक्रमण, टूटी पुलिया और गंदगी जैसी मूलभूत समस्याओं से त्रस्त जनता अब जनप्रतिनिधियों के चक्कर काटकर थक चुकी है। महीनों और सालों तक जब नेताओं के दरवाजों से निराशा हाथ लगी, तो अब पीड़ित जनता ने प्रशासन की ओर रुख कर लिया है।

रोजाना आ रहे ज्ञापन

मिली जानकारी के अनुसार, भवानीमंडी उपखंड कार्यालय इन दिनों जनसमस्याओं के ज्ञापनों का केंद्र बन चुका है। अपनी समस्याओं को लेकर रोजाना पीड़ित लोग 20 से 30 की संख्या में टोलियां बनाकर उपखंड कार्यालय पहुंच रहे हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो उपखंड कार्यालय में औसतन रोजाना 3 ज्ञापन आ रहे हैं। कभी-कभी तो यह संख्या बढ़कर 5 से 6 तक पहुंच जाती है। हालांकि किसी दिन यह आंकड़ा एक या दो पर भी सिमट जाता है, लेकिन ज्ञापनों का यह अनवरत सिलसिला बताता है कि धरातल पर जनता कितनी परेशान है।

जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर बड़ा सवालिया निशान

जनता का इस तरह सीधे प्रशासन के पास गुहार लगाने पहुंचना स्थानीय नेताओं और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले जनप्रतिनिधि जीतने के बाद धरातल से गायब दिख रहे हैं।
लापरवाही की पराकाष्ठा: बुनियादी सुविधाओं के लिए भी जनता का सालों-साल तरसना और फिर मजबूरन प्रशासन के पास जाना, जनप्रतिनिधियों की जनता के प्रति जवाबदेही की लापरवाही की पराकाष्ठा को उजागर करता है।

इस आस में पहुंच रहे उपखंड कार्यालय

ज्ञापन देने आ रहे पीड़ित ग्रामीणों और वार्डवासियों का कहना है कि:
नेताओं को कई बार अवगत कराने के बाद भी सिर्फ कोरे आश्वासन मिले।
अब इस अंतिम आस और विश्वास के साथ प्रशासन को ज्ञापन सौंप रहे हैं कि शायद अधिकारी उनकी सुध लेंगे।
नेताओं से जो काम सालों में नहीं हुआ, उम्मीद है कि प्रशासन उस समस्या का समाधान जल्द करवाएगा।

अब देखना यह है कि जनता ने जिस विश्वास के साथ उपखंड प्रशासन का दरवाजा खटखटाया है, अधिकारी उस पर कितना खरा उतरते हैं ।

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