‘अंधेरे’ क
जगदीश पोरवाल
कहते हैं कि बिजली और किस्मत का कोई भरोसा नहीं होता, लेकिन जब दोनों एक साथ किसी बड़े नेता के सामने रूठ जाएं, तो ‘सिस्टम’ में करंट दौड़ जाता है। कुछ ऐसा ही नजारा जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में देखने को मिला, जहाँ केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव मीडिया के सामने मोदी सरकार के ‘चमकते’ हुए सालों की उपलब्धियाँ गिना रहे थे। पर अफ़सोस, बिजली विभाग को यह चमक कुछ ज़्यादा ही रास आ गई और उन्होंने मंत्री जी को ज़मीनी हकीकत का ‘लाइव एक्सपीरियंस’ देने की ठान ली।
तीन बार बत्ती गुल हुई
फिर क्या था? एक बार नहीं, दो बार नहीं, पूरे तीन बार बत्ती गुल हुई! रेल मंत्री जी पूरे १५ मिनट तक घने अंधकार में बैठकर विकास की रोशनी तलाशते रहे। गनीमत रही कि टीवी कैमरों की लाइट चालू थी, वरना सरकार की उपलब्धियाँ अँधेरे में ही गुम हो जातीं।
आम जनता की ‘खराबी’ बनाम वीआईपी ‘जांच’
इस पूरे घटनाक्रम पर कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने तीखे और सटीक कार्टून से सत्ता के दोहरे मापदंडों पर करारा प्रहार किया है। कार्टून साफ तौर पर बयां करता है कि कैसे इस देश में ‘बिजली जाने’ की परिभाषा चेहरे देखकर बदल जाती है:
आम जनता के घर बत्ती गुल:
जब आपके या हमारे घर की बिजली कटती है, तो विभाग का एक ही रटा-रटाया जवाब आता है— “अरे भाई, तकनीकी खराबी है, ट्रांसफार्मर फुंक गया है, सब्र रखो।” जनता गर्मी में पसीना बहाती रहे, लालटेन खोजती रहे, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
पार्टी कार्यालय में बत्ती गुल: लेकिन जब वही बत्ती किसी रसूखदार दफ्तर या मंत्री के सामने गुल हो जाए, तो वह ‘तकनीकी खराबी’ रातों-रात एक “राष्ट्रीय आपदा” में बदल जाती है। तुरंत ऊर्जा मंत्री का बयान आता है कि “लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी” और आनन-फानन में “उच्च स्तरीय जांच समिति” का गठन कर दिया जाता है। एमडी से लेकर जेई तक, पूरे सिस्टम पर जिम्मेदारी का ठीकरा फोड़ दिया जाता है।
बिना जनरेटर का ‘हाईटेक’ दफ्तर
मज़ेदार बात तो यह रही कि खुद को ‘हाईटेक’ कहने वाले इस प्रादेशिक कार्यालय में एक अदद जनरेटर (डीजी सेट) तक मौजूद नहीं था। जब बिजली कटी, तो केंद्रीय मंत्री को हालात संभालते हुए बिना माइक के, केवल लाउडस्पीकर मंगवाकर काम चलाना पड़ा। बेचारे डिस्कॉम के इंजीनियर डबल सर्किट से बिजली सप्लाई बहाल करने के लिए ऐसे भागे, मानो खुद बिजली के तार बन जाएंगे, लेकिन हीरपुरा ग्रिड सब-स्टेशन का फॉल्ट मंत्रियों के रुतबे से भी ज़्यादा ज़िद्दी निकला।
कड़वा सच:
यह घटना और कार्टून इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि आम आदमी जिस बिजली कटौती को अपनी रोज़मर्रा की नियति मानकर ‘पीड़ा’ भुगतता है और शांत रहता है, वही कटौती जब किसी बड़े साहब के सामने हो जाए, तो सिस्टम के अफसरों को दिन में भी तारे (और जांच कमेटियाँ) नज़र आने लगती हैं। सवाल यह नहीं है कि लाइट क्यों गई, सवाल यह है कि जनता की आवाज़ सुनने के लिए आख़िर कितनी बार मंत्रियों के सामने बत्ती गुल करनी पड़ेगी?

