फूल’ खिलाने की तैयारी: इधर शिविर से ‘राहत’, उधर ‘गहलोत-पायलट’ की अंतहीन महाभारत!

‘फूल’ ख

जगदीश पोरवाल

राजस्थान की राजनीति में मौसम भले ही मानसून के आने का हो, लेकिन सियासी गलियारों में ‘चुनावी पसीने’ छूटने लगे हैं। नगर निकाय चुनावों की रणभेरी बजने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी ‘चुनावी मशीनरी’ को गियर में डाल दिया है। 12 जून से 15 जुलाई तक चलने वाले ‘शहरी सेवा शिविर’ केवल पट्टे बांटने या फ्री-होल्ड की फाइलें निपटाने का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये शहरी मतदाताओं के दिलों में ‘कमल’ रोपने की एक अचूक और सोची-समझी खाद-पानी योजना है।

कार्टूनिस्ट अशोक ने इसी सियासी हकीकत को एक कड़क चाय की तरह पेश किया है। कार्टून में कांग्रेस का एक सीधा-साधा कार्यकर्ता अखबार थामे, अपनी ही पार्टी के एक ‘गुस्सैल और असहाय’ नेता को हकीकत का आईना दिखा रहा है।

‘फूलों’ ने कसी कमर, ‘हाथ’ अभी भी है बेअसर!
अखबार में छपी खबर साफ कह रही है—पट्टे, फ्री-होल्ड और नियमन में भारी राहत, शुल्क और प्रीमियम में 100 प्रतिशत की छूट! इसे देखकर कांग्रेस कार्यकर्ता हैरान-परेशान होकर कह रहा है:
“देखा नेताजी, ‘फूल’ (भाजपा) वालों ने तो निकाय चुनावों की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं और जनता को 100% छूट के जाल में फंसाना शुरू कर दिया है!”

व्यंग्य की गहरी मार यहीं पर है। कार्यकर्ता अप्रत्यक्ष रूप से अपने आकाओं को जगाने की कोशिश कर रहा है कि ‘फूल’ वाले तो अपनी खुशबू बिखेरने निकल पड़े हैं, लेकिन उस फूल को तोड़ने के लिए ‘पंजे’ (कांग्रेस) ने अभी तक अपनी मुट्ठी भी नहीं खोली है।

बयानबाजी की ‘नूराकुश्ती’ बनाम ग्राउंड वर्क
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जब विपक्ष (या सत्ता पक्ष) जमीन पर जाकर जनता को रियायतों के ‘लड्डू’ बांट रहा है, तब कांग्रेस के दिग्गज नेता—अशोक गहलोत और सचिन पायलट—आज भी पुरानी कड़वाहट, पुरानी बयानबाजी और “मैंने क्या कहा और तुमने क्या सुना” की अंतहीन ‘जूतमपैजार’ में उलझे हुए हैं।
भाजपा की नीति: जनता के पास जाओ, शिविर लगाओ, नियमन की छूट दो और वोट पक्के करो।
कांग्रेस की स्थिति: दिल्ली की तरफ देखो, आपस में गुटबाजी करो और प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक-दूसरे को ‘अप्रत्यक्ष’ ताने मारो।

तुरुप का इक्का गायब, हाथ में सिर्फ ‘माथा ठोकना’
शहरी मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा ने 12 जून से जो दांव खेला है, उसकी काट ढूंढने में कांग्रेस के थिंक-टैंक के ‘पसीने’ छूट रहे हैं। कांग्रेस के पास फिलहाल इस चुनावी चक्रव्यूह को भेदने के लिए कोई ‘तुरुप का इक्का’ नजर नहीं आ रहा है। कार्टून में खड़े नेताजी के चेहरे के हाव-भाव और उनकी फटी आंखें साफ बयां कर रही हैं कि अंदर ही अंदर उन्हें भी पता है—“जब तक हम अपनों से निपटेंगे, तब तक वो (भाजपा) पूरी बिसात समेट चुके होंगे।”

कार्टूनिस्ट अशोक का यह व्यंग्य कांग्रेस के लिए एक कड़वी चुनावी ‘सिरप’ की तरह है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस कड़वी घूंट को पीकर जागती है, या फिर ‘गहलोत-पायलट’ की अमर गाथा के अगले एपिसोड की स्क्रिप्ट लिखने में ही व्यस्त रहती है! उधर जनता तो यही कह रही है—“जो पट्टा दिलाएगा, वोट उसी के खाते में जाएगा!”

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