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जगदीश पोरवाल
आज के दौर में जब देश ‘डिजिटल इंडिया’ के रथ पर सवार होकर बुलेट ट्रेन की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, तब अचानक पता चलता है कि रथ का पहिया तो ‘इंटरनेट शटडाउन’ के गड्ढे में फंस गया है। ताज़ा मामला जयपुर का है, जहाँ सड़क चौड़ी करने और अतिक्रमण हटाने के लिए भारी भरकम बुलडोज़र के साथ-साथ सरकार ने ‘डिजिटल बुलडोज़र’ भी चला दिया और पूरे 24 घंटे के लिए इंटरनेट को ही ‘अतिक्रमण’ मानकर साफ कर दिया।
कार्टूनिस्ट अशोक ने इसी विडंबना पर अपनी कूची से तीखा प्रहार किया है। कार्टून में दो कौवे बैठकर देश की डिजिटल साख पर मजे ले रहे हैं—एक कह रहा है, “डिजिटल इंडिया शर्मिंदा,” तो दूसरा उससे भी बड़ा दार्शनिक सवाल दाग रहा है कि “जहाँ इंटरनेट बंद करना समाधान बन जाए, वहाँ डिजिटल इंडिया खुद एक सवाल बन जाता है।” नीचे जनता अपने खाली मोबाइल को देखकर पसीने-पसीने हो रही है, मानो पूछ रही हो—साहब, सड़क तो चौड़ी हो गई, पर हमारे रोजगार की गली इतनी संकरी क्यों कर दी?
’क्लिक’ से पहले ‘ब्लैकआउट’ का शॉर्टकट
चाहे नीट (NEET) की परीक्षा हो, कैट (CAT) का इम्तिहान हो, या पुलिस भर्ती; हमारे सिस्टम के पास मुन्नाभाइयों से निपटने का एक ही अचूक और सबसे आलसी ब्रह्मास्त्र है—”इंटरनेट बंद कर दो!” दो पक्षों में कहासुनी हो जाए या कोई आंदोलन करवट ले रहा हो, प्रशासन सबसे पहले डेटा का गला घोंटता है ताकि अफवाहें न फैलें।
लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अफवाहें रोकने के चक्कर में पूरी अर्थव्यवस्था को वेंटिलेटर पर डाल देना कहाँ की समझदारी है? आज चाय की टपरी से लेकर बड़े कॉर्पोरेट दफ्तर तक, और राशन की दुकान से लेकर बैंक के सर्वर तक, सब कुछ इसी इंटरनेट की डोरी से बंधा है। जब सरकार ही इस डोरी को झटके से काट देती है, तो डिजिटल इंडिया की बड़ी-बड़ी बातें किसी ‘नो सिग्नल’ वाले स्क्रीन जैसी दिखने लगती हैं।
जब मर्ज सोशल मीडिया है, तो सजा पूरे इंटरनेट को क्यों?
अगर प्रशासन को अफवाहों का डर है, तो तकनीक के इस दौर में सिर्फ व्हाट्सऐप, फेसबुक या एक्स (ट्विटर) जैसे चुनिंदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कुछ समय के लिए थामना क्या नामुमकिन है? पूरी डिजिटल रीढ़ की हड्डी को ही तोड़ देना समझ से परे है।
व्यापारी परेशान हैं, वर्क-फ्रॉम-होम वाले कर्मचारी सिर पकड़ कर बैठे हैं और ऑनलाइन बैंकिंग करने वाले खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। इस कार्टून के जरिए सरकार को यही आईना दिखाया गया है कि डिजिटल होने का ढिंढोरा पीटना और बात-बात पर इंटरनेट का स्विच ऑफ कर देना, दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं।
अगर हर समस्या का समाधान ‘शटडाउन’ ही है, तो फिर इस ‘डिजिटल इंडिया’ के चमचमाते डिब्बे का जनता क्या करे, जिसमें नेटवर्क ही गायब हो?

