सरकारी कुर्सी’ की चमत्कारी खाद: किसानों के खेत भले सूखें, अफसरों की तिजोरी में उगे 2.44 करोड़ रुपये!

जगदीश पोरवाल

कहते हैं कि देश की सबसे उपजाऊ ज़मीन पंजाब या उत्तर प्रदेश के मैदानों में है, लेकिन राजस्थान से आई एक ताज़ा ‘कृषि खोज’ ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। भ्रष्टाचार के वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है कि देश की सबसे उपजाऊ ज़मीन कहीं और नहीं, बल्कि “सरकारी कुर्सी” है, जहाँ बिना मानसून के भी करोड़ों रुपयों की फसल लहलहा उठती है।

ताज़ा मामला बीज निगम के ‘परम ज्ञानी’ निदेशक महोदय और उनके पांच आज्ञाकारी सहयोगियों का है। इन लोगों ने कृषि जगत में एक नया क्रांतिकारी प्रयोग करने की ठानी थी। प्रयोग यह था कि भोले-भाले किसानों को 15 करोड़ रुपए के ‘नकली और घटिया’ बीज थमा दिए जाएं, ताकि खेतों में अनाज भले ही न उगे, लेकिन साहब लोगों के घरों में ‘नोटों की फसल’ बंपर पैदा हो।

मामा-भांजे’ का अद्भुत कृषि मॉडल

इस पूरे घोटाले में ‘पारिवारिक प्रेम’ की भी एक अनोखी मिसाल देखने को मिली। जब एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने रेड मारी, तो पता चला कि साहब के भांजे साहब बस में 85 लाख रुपए का ‘छोटा सा’ बंडल लेकर घूम रहे थे। पकड़े जाने पर भांजे ने मासूमियत से कहा, “ये पैसे मेरे नहीं, मामा के हैं!” वाह! इसे कहते हैं संस्कारी भांजा, जो मामा के ‘भ्रष्टाचार की कमाई’ को सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाने के लिए परिवहन निगम की बस में सफर कर रहा था।
कुल मिलाकर, एसीबी ने मामा-भांजे और दलालों के ठिकानों से 2.44 करोड़ रुपए की नकद ‘फसल’ ज़ब्त की है। जनता हैरान है कि जिस देश में आम आदमी एटीएम की लाइन में 2000 रुपये के लिए जूझ जाता है, वहाँ इन अफसरों के घरों में 1.59 करोड़ रुपये इस तरह बिखरे पड़े थे जैसे गोदाम में मूंगफली की बोरियां रखी हों।

कार्टूनिस्ट का तीखा वार

प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक ने भी इस पूरे ड्रामे पर अपनी कूची से करारा तंज कसा है। उनके कार्टून ने व्यवस्था के मुंह पर तमाचा मारते हुए साफ कर दिया है कि सरकारी कुर्सियों पर बैठे ये ‘भ्रष्टाचार रूपी भेड़िए’ किसानों की रीढ़ तोड़ने की पूरी तैयारी में थे।
एक बड़ा सवाल: अगर यह नकली बीज बाज़ार में चला जाता, तो किसान भाई अपनी किस्मत और ज़मीन को कोस रहे होते। वे सोचते कि शायद उनकी मेहनत में कमी थी, जबकि असली ‘दीमक’ तो जयपुर और बीकानेर के वातानुकूलित कमरों में बैठकर उनकी मेहनत को चट कर रहे थे।

एसीबी’ बनी रक्षक

गनीमत रही कि एसीबी ने समय रहते इस ‘भ्रष्ट सिंडिकेट’ की फसल काट दी, वरना बाज़ार में जो फसल आती, वो अनाज नहीं, बल्कि पूरी तरह से ‘घोटाला ब्रांड’ होती। फिलहाल निदेशक महोदय और उनके संगी-साथी अब सरकारी मेहमान हैं, और देखना यह है कि जेल की सलाखों के पीछे उन्हें ‘कुर्सी’ जैसी उपजाऊ ज़मीन मिल पाती है या नहीं!

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