घरेलू गैस की ‘उड़ान’ बनाम नेताओं की ‘पुरानी तान’: आम आदमी की जेब और ज़हन पर दोहरी मार

​- जगदीश पोरवाल

​राजस्थान का पारा इन दिनों वैसे ही आसमान छू रहा है, लेकिन इस झुलसाती गर्मी के बीच आम जनता को आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर दोहरी तपन झेलनी पड़ रही है। एक तरफ जहाँ घरेलू एलपीजी सिलेंडर के बढ़ते दाम आम आदमी की जेब को झुलसा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सूबे की सियासत में पुरानी कड़वाहट के नए पन्ने खुलने से राजनीतिक माहौल गरमा गया है। मशहूर कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने दो ताज़ा कार्टूनों के ज़रिए जनता के इस दोहरे दर्द और राजनीतिक विडंबना पर बेहद तीखा और करारा व्यंग्य किया है।

​1. एलपीजी की ‘बढ़त’: महिलाओं की सहनशक्ति का कड़ा इम्तिहान
​महंगाई के इस दौर में आम आदमी की रसोई एक बार फिर आर्थिक और सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में आ गई है। हाल ही में घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में 29 रुपये की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस पर तीखा कटाक्ष करते हुए कार्टूनिस्ट अशोक ने जनता के मौन दर्द को बेहद सजीवता से उकेरा है।
​कार्टून का दृश्य और मर्म
​कार्टून में एक मध्यमवर्गीय परिवार का दृश्य है, जहाँ एक गृहिणी हाथ में ’29 रुपये की बढ़ोतरी’ की खबर वाला अखबार थामे खड़ी है, और दूसरी तरफ उसका पति स्कूटर पर बैठकर कहीं जाने की तैयारी में है। दोनों के बीच का संवाद सीधे दिल पर चोट करता है:

​गृहिणी का तंज: “देखा, तुम्हारे पेट्रोल में तो कभी दो, कभी पांच रुपए ही बढ़ते हैं।”

​पति का करारा जवाब: “हाँ, सरकार भी महिलाओं की सहनशक्ति समझती है।”

​व्यंग्य का मर्म: यह संवाद सीधे तौर पर इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि व्यवस्था भी मान चुकी है कि देश की रसोई संभालने वाली महिलाओं की ‘सहनशक्ति’ असीमित है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में चंद रुपयों के उतार-चढ़ाव पर शोर मचाने वाला पुरुष समाज भी रसोई गैस के इस तगड़े झटके के सामने पूरी तरह निरुत्तर और बेबस नजर आ रहा है।

​2. राजस्थान की राजनीति: ‘पुरानी कड़वाहट’ का नया मौसम
​जहाँ एक तरफ जनता रसोई के बजट को संतुलित करने में अपनी पूरी ऊर्जा खपा रही है, वहीं दूसरी तरफ राजस्थान की सियासत में नेताओं की ऊर्जा ‘पुरानी फाइलों’ को खंगालने और एक-दूसरे पर ‘बयानों के तीर’ चलाने में खर्च हो रही है। मौसम विभाग भले ही प्रदेश में हल्की ‘बूंदाबांदी’ की भविष्यवाणी कर रहा हो, लेकिन कांग्रेस के भीतर बयानों का भारी ‘तूफ़ान’ खड़ा हो चुका है।

​’मानेसर’ और ’25 सितंबर’ की रह-रहकर आती यादें

​अखबारों की सुर्खियां एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेता सचिन पायलट के बीच के पुराने अंतर्विरोधों से गर्म हैं। राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट का नाम आते ही सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। हाल ही में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री ने मानेसर की घटना और 25 सितंबर 2022 के उस बहुचर्चित सियासी घटनाक्रम पर खुलकर बात की है, जिसने कभी आलाकमान की रातों की नींद उड़ा दी थी।
​कार्टूनिस्ट ने कांग्रेस कार्यालय के बाहर दो नेताओं को खड़े दिखाकर इसी अंदरूनी खींचतान पर सटीक चोट की है, जहाँ एक नेता मौसम की ‘बूंदाबांदी’ की बात कर रहा है, तो दूसरा हाथ में ‘गहलोत का बयान’ थामे चेतावनी दे रहा है कि असल तूफ़ान तो पार्टी के भीतर आने वाला है।

​जनता का सुलगता सवाल: सिलेंडर पर ‘चर्चा’ कब होगी?

​राजनीतिक गलियारों में आज भी ‘मानेसर प्रकरण’, पुरानी गलतियों और एक-दूसरे को ‘स्वीकार करने’ या ‘नसीहतें देने’ का दौर बदस्तूर जारी है। अनुभवी नेता सलाह दे रहे हैं कि राजनीति में उम्र और अनुभव बढ़ने के साथ-साथ अपनी गलतियों को मानना भी सीखना चाहिए।
​लेकिन इन सबके बीच आम जनता इस पूरे परिदृश्य को देखकर बस यही सोच रही है:
​नेताओं के बीच ‘वर्चस्व’ और ‘अस्तित्व’ की यह लड़ाई तो सालों-साल चलती रहेगी…
​लेकिन क्या कभी किसी राजनीतिक मंच पर आम गृहिणी द्वारा इस बढ़े हुए सिलेंडर को स्वीकार करने की लाचारी पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा होगी?

फिलहाल की कड़वी हकीकत यही है कि जनता महंगाई के इस भारी-भरकम पहिये के नीचे दबी जा रही है, और सूबे की सियासत जनहित के मुद्दों को छोड़कर पुराने पन्नों को पलटने और अपनी गोटियां सेट करने में मशगूल है।

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