जगदीश पोरवाल
आज पूरे देश में ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ उसी पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जा रहा है, जैसे हर साल कागजों पर मनाया जाता है। भाषण दिए जा रहे हैं, बड़े-बड़े बैनर टांगे जा रहे हैं और मिलावटखोरी को देश से उखाड़ फेंकने की कसमें खाई जा रही हैं। इसी पावन अवसर पर कार्टूनिस्ट अशोक ने एक बेहद “असंवेदनशील” कार्टून बनाकर हमारी सरकारी व्यवस्था की उस अद्भुत कार्यप्रणाली पर तंज कस दिया है, जो मिलावटखोरों और अधिकारियों के बीच के ‘मधुर संबंधों’ को उजागर करती है।
कार्टून में साफ़ दिखाया गया है कि आम आदमी जब आज अखबार में ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ की बड़ी-बड़ी सुर्खियां पढ़ रहा है, तो उसका पारा सातवें आसमान पर है। वह चिल्लाकर कह रहा है—“पहले यह मिलावट रोकिए… फिर मनाइए दिवस!” क्योंकि उसकी थाली में परोसा जाने वाला खाना नहीं, बल्कि रसायन विज्ञान की पूरी पीरियोडिक टेबल (आवर्त सारणी) है।
‘स्पेशल मेन्यू’ पर एक नज़र
विभागीय लापरवाही और मिलावटखोरों की असीम कृपा से आज आम जनता के राशन की लिस्ट कुछ इस तरह दिख रही है:
दूध: डिटर्जेंट, स्टार्च और यूरिया का ‘हाई प्रोटीन’ मिश्रण।
घी: विशुद्ध पाम ऑयल का तड़का।
मसाले: पेट को मजबूत बनाने के लिए लकड़ी का बेहतरीन बुरादा।
फल: कॉपर सल्फेट की चमक के साथ।
हरी सब्जियां: ‘मैलाकाइट ग्रीन’ का खतरनाक, सदाबहार हरा रंग।
मिठाइयाँ: स्टार्च और जानलेवा सिंथेटिक रंगों की मिठास।
“सावधान! हम छापा मारने आ रहे हैं”
सूत्रों (और आम जनता के कॉमन सेंस) के मुताबिक, सरकार मिलावटखोरी को रोकने के लिए समय-समय पर ‘महा-अभियान’ और ‘पखवाड़े’ चलाती है। इस अभियान की सबसे खूबसूरत बात यह होती है कि इसकी घोषणा हफ़्तों पहले ढोल-नगाड़े बजाकर कर दी जाती है। ताकि मिलावटखोर भाई-बहनों को अपनी यूरिया, पाम ऑयल और सिंथेटिक रंगों की खेप को तहखानों में छुपाने का पर्याप्त समय मिल सके।
विभाग की इस ‘अग्रिम सूचना सेवा’ का मिलावटखोर दिल से आभार जताते हैं। नतीजा यह होता है कि हफ्ते-दस दिन के इस ‘सफाई अभियान’ में अधिकारियों को केवल शुद्ध हवा और खाली गोदाम मिलते हैं, जिनकी तस्वीरें खिंचवाकर वे अपनी पीठ थपथपा लेते हैं।
जेबें गरम, सेहत ठंडी!
जनता का आरोप है कि खाद्य विभाग के कुछ बेहद ‘कर्मठ’ अधिकारी और कर्मचारी अपनी जेबों के तापमान को ‘गरम’ रखने के बदले में मिलावटखोरों को सरकारी पनाह की ठंडी छांव मुहैया कराते हैं। जब जेबें हरी-भरी हो जाती हैं, तो सब्जियों का जानलेवा हरा रंग भी अधिकारियों को ‘ऑर्गेनिक’ नजर आने लगता है।
बड़ा सवाल: अगर ये रखवाले सिर्फ एक बार ईमानदारी की लाठी उठा लें और बिना ‘अपॉइंटमेंट’ लिए मिलावटखोरों की चौखट पर पहुंच जाएं, तो किसी मिलावटखोर की क्या मजाल कि वह आम आदमी की जान से खिलवाड़ कर सके? लेकिन शायद, ‘दिवस’ मनाने का मजा तभी है जब समस्या जिंदा रहे!
फिलहाल, आप सभी को डिटर्जेंट युक्त दूध की चाय और चमकीली हरी सब्जियों के सलाद के साथ ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएं! पेट का ध्यान रखिएगा, क्योंकि विभाग तो सिर्फ जेब का रख रहा है।

