एक दिन के पर्यावरण प्रेमी: आज एक-दो पौधे रोपकर सैकड़ो पर्यावरण प्रेमी बनगें ?


ड़कें चौड़ी, सांसें संकड़ी: विकास की अंधी दौड़ में उजड़ता पर्यावरण ,
“सच बात सही खबर”

जगदीश पोरवाल

आज जब हम आधुनिकता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, गगनचुंबी इमारतें खड़ी कर रहे हैं और कंक्रीट के हाईवे बिछा रहे हैं, तब हमारे पैर उस जमीन से उखड़ते जा रहे हैं जो हमें जीवन देती है। विकास की इस अंधी दौड़ का सबसे बड़ा शिकार हमारा पर्यावरण हो रहा है। इसी कड़वी हकीकत को बयां करता कार्टूनिस्ट अशोक जी का एक हालिया स्केच सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक चर्चा का विषय बना हुआ है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम तरक्की की कैसी कीमत चुका रहे हैं।

पर्यावरण के नाम पर नौटंकी करते हैं
कार्टूनिस्ट अशोक ने जो नेता , आम आदमी और ठेकेदार पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं ,उन लोगों पर व्यंग्य के बाण चलाए हैं । पेड़ काटो, पहाड़ खोदो, नदिया सुखाओ ,एक तरफ तो रात के अंधेरे में यह काम करते हैं और दूसरी तरफ एक पौधा लगाकर नौटंकी करते हैं । एक पौधा लगाकर फोटो खींचाने आते हैं और उस फोटो को इस तरह वायरल करते हैं कि जैसे हम ही सच्चे पर्यावरण हितैषी है । वाह भाई वाह गजब के पर्यावरण प्रेमी है ऐसे लोग , ऐसे दिखावटी पर्यावरण प्रेमी के आगे वह पर्यावरण प्रेमी दब जाते हैं जो दिन रात पौधों की देखभाल कर उनको बड़ा करना मिशन समझते हैं और अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं । पर्यावरण प्रेमी की नौटंकी कर उसकी वाही वाही लुटकर वह सोशल मीडिया पर ऐसे प्रचार करते हैं कि सच्चे पर्यावरण प्रेमी वही है । वास्तव में जो सच्चे पर्यावरण प्रेमी होते हैं वह सोशल मीडिया में प्रचार तक भी नहीं करते हैं ।

कागज पर हरियाली, जमीन पर कंक्रीट का जाल
प्रशासनिक फाइलों में हर साल लाखों पौधे लगाने और ‘गो ग्रीन’ के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल की सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। विकास के नाम पर दशकों पुराने छायादार पेड़ों को चंद मिनटों में धराशायी कर दिया जाता है। सड़कें तो चौड़ी हो रही हैं, लेकिन इंसानी सांसें संकड़ी होती जा रही हैं।
अशोक जी के कार्टून का तीखा व्यंग्य सीधा इसी व्यवस्था पर चोट करता है—जहां इंसान विकास के नाम पर खुद अपनी छांव काटने में मसरूफ है। हम फैक्ट्रियां लगा रहे हैं, गाड़ियां बढ़ा रहे हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि फैक्ट्रियों के धुएं और गाड़ियों के शोर के बीच जब फेफड़ों को ऑक्सीजन चाहिए होगी, तो वह किसी मॉल या हाईवे पर नहीं, बल्कि एक पेड़ की डाल पर ही मिलेगी।
बदलते मौसम चक्र की चेतावनी
पर्यावरण से इस कदर खिलवाड़ का नतीजा अब हमारे सामने है। समय पर बारिश न होना, गर्मियों में रिकॉर्ड तोड़ तापमान और भूजल स्तर का लगातार पाताल में जाना—ये सब प्रकृति की वो चेतावनियाँ हैं जिन्हें हम लगातार अनदेखा कर रहे हैं। यदि आज भी समाज और प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और पानी सिर्फ किताबों में ही देखने को मिलेगा।
“सच बात सही खबर” का नज़रिया:
विकास ज़रूरी है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर मिलने वाला विकास असल में विनाश का आमंत्रण है। ज़रूरत इस बात की है कि सरकारें और समाज मिलकर ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ (सतत विकास) को अपनाएं। अगर एक पेड़ काटा जाता है, तो कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर पांच नए पेड़ बड़े होने तक उनकी जिम्मेदारी ली जाए।



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