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- व्यंग्य समाचार
जगदीश पोरवाल - विश्व साइकिल दिवस के पावन अवसर पर देशभर में साइकिल को लेकर अचानक प्रेम उमड़ पड़ा। सरकारी विभागों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों ने जनता से अपील की कि “देश हित, स्वास्थ्य हित और जेब हित के लिए साइकिल चलाएं।”
- कार्टूनिस्ट अशोक के चर्चित कार्टून में भी एक सज्जन मुस्कुराते हुए साइकिल चला रहे हैं और बड़े गर्व से लगे बोर्ड को निहार रहे हैं। लेकिन सड़क पर पड़ा अखबार कुछ और ही कहानी सुना रहा है—”पेट्रोल-डीजल की किल्लत और बढ़ते दाम”।
सूत्रों के अनुसार, जैसे ही पेट्रोल महंगा हुआ, साइकिल अचानक राष्ट्रभक्ति, स्वास्थ्य और बचत का प्रतीक घोषित कर दी गई। हालांकि यह उत्साह केवल “आज” तक ही सीमित रहने की संभावना है। कल से फिर वही ट्रैफिक जाम, वही मोटरसाइकिल और वही पेट्रोल पंपों की कतारें देखने को मिल सकती हैं। - हमारे यहां अधिकांश अभियान “दिवस आधारित” होते हैं। पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाए जाते हैं, योग दिवस पर योग किया जाता है, जल दिवस पर पानी बचाने की शपथ ली जाती है और साइकिल दिवस पर साइकिल चलाने की सलाह दी जाती है। अगले दिन सब कुछ सामान्य हो जाता है, मानो अभियान नहीं बल्कि वार्षिक त्योहार मनाया गया हो।
- “पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो सरकार हमें साइकिल की याद दिलाती है। अगर दाम और बढ़े तो शायद बैलगाड़ी दिवस भी घोषित कर दिया जाए।”
- उधर साइकिल निर्माताओं ने भी खुशी जताई है। उनका कहना है कि हर साल एक दिन के लिए ही सही, देश को याद तो आता है कि साइकिल नाम की भी कोई चीज़ है।
- राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कार्टून का असली संदेश साइकिल नहीं, बल्कि अभियानों की “वन-डे क्रिकेट” शैली पर है। समस्या साल भर रहती है, समाधान का प्रचार एक दिन चलता है और फिर अगले वर्ष उसी तारीख का इंतजार किया जाता है।
- व्यंग्य का निष्कर्ष यही है कि यदि साइकिल वास्तव में देश, स्वास्थ्य और जेब—तीनों के हित में है, तो उसे केवल एक दिवस की शोभा न बनाकर रोजमर्रा की संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा। वरना हर साल साइकिल दिवस आएगा, फोटो खिंचेंगे, भाषण होंगे और अगले दिन फिर पेट्रोल के बढ़ते दामों पर चर्चा होगी।

