दशकों पुराना भूमि विवाद सुलझा: उपखंड कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय, ‘श्रीराम मंदिर’ के नाम दर्ज होगी साढ़े 18 बीघा भूमि
भवानीमंडी | 02 जून, 2026
उपखंड न्यायालय भवानीमंडी ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कस्बा पचपहाड़ स्थित ऐतिहासिक ‘श्रीराम मंदिर’ की बहुमूल्य भूमि को पुनः मंदिर के नाम दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं। राजस्व रिकॉर्ड में हुई एक गंभीर लिपिकीय त्रुटि (clerical error) के कारण पिछले पाँच दशकों (50 वर्ष) से अधिक समय से यह भूमि पुजारी परिवार के नाम दर्ज चली आ रही थी, जो राजस्थान काश्तकारी अधिनियम के विधिक प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन था।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद वर्ष 2011 में न्यायालय के समक्ष आया था, जब संबंधित पुजारी परिवार एवं वर्तमान खातेदारों में से एक पक्ष ने वाद प्रस्तुत किया। प्रार्थी पक्ष ने ग्राम मांडवी स्थित कुल 18 बीघा 8 बिस्वा (लगभग साढ़े अठारह बीघा) भूमि को पुनः ‘श्रीराम मंदिर पचपहाड़’ के स्वामित्व में दर्ज करने का आग्रह किया था।
इससे पूर्व, लोक अदालत द्वारा भी इस भूमि को मंदिर के नाम दर्ज करने का आदेश दिया गया था, किंतु द्वितीय पक्ष द्वारा अपीलीय न्यायालय में चुनौती दिए जाने के कारण यह प्रकरण पुनः उपखंड न्यायालय भवानीमंडी को प्रेषित कर दिया गया था। लंबे समय से लंबित चल रहे इस मामले को ‘मंदिर माफी’ की भूमि से संबद्ध होने के कारण न्यायालय द्वारा अत्यंत संवेदनशीलता व गंभीरता से लिया गया।
जांच में सामने आई सच्चाई
प्रकरण में प्रस्तुत साक्ष्यों और तहसीलदार पचपहाड़ द्वारा प्रेषित विस्तृत जांच रिपोर्ट के सूक्ष्म अवलोकन से यह तथ्य पूरी तरह सिद्ध हुआ कि यह विवादित भूमि मूल रूप से ‘खाता मुआफियत’ के अंतर्गत ‘मंदिर श्री राम जी पचपहाड़’ के नाम ही दर्ज थी।
“कानूनन, देवता एक ‘शाश्वत नाबालिग’ हैं”
न्यायालय ने माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायालयों का यह परम विधिक दायित्व है कि वे नाबालिगों, दिव्यांगों और ‘देवता’ (Deity) के हितों की अटूट रक्षा करें। कानूनन, देवता को एक ‘शाश्वत नाबालिग’ (Perpetual Minor) माना गया है, जो राज्य के विशेष विधिक संरक्षण के पात्र हैं।
भूमि के हस्तांतरण और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध
02 जून, 2026 को इस बहुप्रतीक्षित मामले में अंतिम निर्णय पारित करते हुए उपखंड अधिकारी सुश्री श्रद्धा गोमे ने न केवल विवादित भूमि को पुनः श्रीराम मंदिर के नाम दर्ज करने का निर्देश दिया, बल्कि भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए इस भूमि को किसी भी व्यक्ति द्वारा विक्रय अथवा हस्तांतरित (Transfer) किए जाने पर कानूनी रूप से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
उपखंड न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले का स्थानीय जनता, श्रद्धालुओं और सामाजिक संगठनों ने हर्ष व्यक्त करते हुए व्यापक स्वागत किया है।

