जगदीश पोरवाल
राज्य में इन दिनों ‘वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान’ के तहत आंकड़ों की ऐसी मूसलाधार बारिश हो रही है कि आम जनता बिना पानी के ही भीगने को मजबूर है। सरकारी दावों की बुलेट ट्रेन इतनी रफ्तार से दौड़ रही है कि मात्र 5 दिनों में 7.31 लाख कार्यक्रमों का पड़ाव पार कर चुकी है। इस गति को देखकर लगता है कि राज्य में पानी बचे न बचे, लेकिन कागजों पर रिकॉर्ड जरूर ‘वाटरप्रूफ’ हो जाएगा।
जमीनी हकीकत: आंकड़ों की बाढ़ बनाम सूखे पड़े जलस्रोत
प्रशासनिक रिपोर्टों की मानें तो करीब 3 करोड़ नागरिक इस अभियान में अपनी आहुति दे चुके हैं। लाखों कुओं, बावड़ियों और तालाबों की ‘कागजी’ सफाई इतनी तेजी से हुई है कि खुद जल देवता भी हैरान हैं। लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके ठीक उलट है। मशहूर कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने नए स्केच में इसी विरोधाभास पर तीखा प्रहार किया है।
कार्टून में एक जागरूक नागरिक हाथ में भारी-भरकम सरकारी आंकड़ों का पुलिंदा थामे बड़े उत्साह से चिल्ला रहा है— “पढ़ा तुमने! 3 करोड़ नागरिकों की सहभागिता… 7-31 लाख कार्यक्रम!” वहीं पास में खाली बाल्टी लटकाए खड़ा एक आम आदमी, जिसके चेहरे पर पानी की किल्लत और प्रशासनिक दावों की बेबसी साफ दिख रही है, बेहद सधे हुए अंदाज में जवाब देता है:
“जमीन पर सूखा है, लेकिन आंकड़ों की बाढ़ आ गई है…”
बुलेट ट्रेन सी रफ्तार, पीछे सिर्फ ‘धूल का गुब्बार’
इस पूरे अभियान का चरित्र ऐसा हो गया है जैसे कोई बुलेट ट्रेन तेजी से गुजर जाए और पीछे सिर्फ धूल का गुब्बार छोड़ जाए। मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए तैयार किए जा रहे ये आंकड़े वर्तमान में केवल फाइलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। हकीकत यह है कि यह सारी मुस्तैदी और तामझाम सिर्फ अभियान की अवधि (महोत्सव) तक ही सीमित रहता है। जैसे ही नेताओं के दौरे और कैमरों की फ्लैश लाइट बंद होगी, ये सारे साफ किए गए जलस्रोत फिर से अपनी पुरानी बदहाली पर आंसू बहाते नजर आएंगे।
…तो कैसे बुझेगी प्यास?
बुद्धिजीवियों और जमीनी जानकारों का मानना है कि अगर इस अभियान को सचमुच ‘जन आंदोलन’ बनाना है, तो इसे केवल राजधानी के वातानुकूलित कमरों और जनसंपर्क विभागों के आंकड़ा-उद्योग से बाहर निकालना होगा।
जब तक इस अभियान की कमान सीधे ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं को नहीं सौंपी जाएगी और इसकी जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जनता की बाल्टियाँ ऐसी ही सूखी रहेंगी। फिलहाल तो स्थिति यही है कि जनता बूंद-बूंद पानी को तरस रही है और सरकार आंकड़ों के समंदर में गोते लगा रही है!

