जब साहबों की ‘कुर्सी’ और ‘पेंशन’ दोनों ने बोल दिया ‘बाय-बाय’!



जगदीश पोरवाल

सरकारी गलियारों में सालों से एक कहावत मशहूर थी— “नौकरी मिले सरकारी, तो कटती है ऐश की जिंदगी सारी!” लेकिन जयपुर से आई ताजा खबरों ने इस मुहावरे का ‘सिस्टम’ ही बिगाड़ दिया है। राज्य के प्रशासनिक महकमे में अचानक एक ऐसा वायरस फैला है, जिसे डॉक्टर “ज़ीरो टॉलरेंस” कह रहे हैं। इस वायरस का पहला लक्षण है—हाथ से सरकारी फाइल का छूटना और दूसरा लक्षण है—सीधे घर बैठने का परवाना मिलना।

कल तक जो अफसर ‘आय से अधिक संपत्ति’ के पहाड़ों पर बैठकर नीचे की दुनिया को चींटी बराबर समझते थे, कार्टूनिस्ट अशोक ने कार्टून में व्यंगात्मक लहजे में बताया कि आज वो खुद दीवार पर बैठे कौए की आवाज़ सुनकर चौंक रहे हैं। कौआ चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है— “अहा! अब आए ऊँट पहाड़ के नीचे!” हालांकि कुछ साहबों का मानना है कि इस बार पहाड़ ही खिसककर ऊँट के ऊपर आ गिरा है।

‘महा-सफाई’ का स्कोरकार्ड: किसने बनाए कितने रन?

सरकारी मैदान पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जो मैच खेला गया, उसका स्कोरकार्ड कुछ इस तरह है:
सस्पेंशन पवेलियन (103 नॉट आउट): पूरे 103 अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से ‘टेंपरेरी रेस्ट’ यानी सस्पेंड कर दिया गया है। इसमें एक बड़े आईएएस (IAS) साहब भी शामिल हैं, जो अब सोच रहे हैं कि ‘लाल बत्ती’ के बिना गाड़ी में सफर कैसे होता है।
क्लीन बोल्ड (6 बर्खास्त): 6 अधिकारियों की तो सीधे टीम से छुट्टी ही कर दी गई है। अब न तो दफ्तर में ‘साहब’ का बोर्ड रहेगा और न ही टेबल के नीचे से आने वाली ‘चाय-पानी’ की मनुहार।
नो पेंशन, ओनली टेंशन (11 पर आजीवन पाबंदी): 11 भ्रष्ट अफसरों की तो किस्मत ही रूठ गई। सरकार ने उनकी शत-प्रतिशत (100%) पेंशन पर ‘आजीवन पाबंदी’ का ताला जड़ दिया है। यानी अब बुढ़ापे में ‘मलाई’ तो दूर, सूखी रोटी के लिए भी ‘नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) ढूंढना पड़ेगा।
अभियोजन की ‘सेंचुरी’ (108 मामले): 108 मामलों में कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने की अनुमति मिल चुकी है। अब साहब लोग दफ्तर की फाइलों की जगह वकीलों की तारीखों की फाइलें संभालेंगे।

पानी की जांच में ‘फर्जीवाड़ा’ और ‘ऊँट’ की कसमसाहट

इस पूरी कार्रवाई में सबसे अनोखा मामला उस वैज्ञानिक का रहा, जिसने जनता के पीने के पानी की गुणवत्ता जांच में ही ‘फर्जी रिपोर्ट’ का तड़का लगा दिया था। अब उन्हें प्रयोगशाला से सीधे ‘घर की शाला’ भेज दिया गया है।

दफ्तरों के बाहर खड़े चपरासी अब फुसफुसा रहे हैं कि पहले साहब लोग कहते थे— “हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” लेकिन आज वही साहब हाथ में अखबार की कटिंग थामे, पसीना पोंछते हुए बगल से गुजर रहे हैं।

सचिवालय के गलियारों में अब ‘टेबल के नीचे’ पैर रखने से भी लोग डर रहे हैं, कहीं वहां कोई ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ का जाल न बिछा हो। कौआ अभी भी मुंडेर पर बैठा है और अगले विकेट गिरने का इंतजार कर रहा है!

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