जगदीश पोरवाल
आज सोशल मीडिया पर कार्टूनिस्ट अशोक का एक व्यंग्य खूब चर्चा में है। कार्टून में जेल के बाहर खड़ा पुलिसकर्मी कहता नजर आता है —
“हाँ, यार ऐसी सुविधा अपने राजस्थान में भी होनी चाहिए!”
कार्टून के साथ अखबार में छपी खबरों ने इस व्यंग्य को और धार दे दी। खबर छपी है कि राम रहीम 16वीं बार जेल से बाहर आया है और उसे फिर 30 दिन की पैरोल मिली है। खबर में यह भी उल्लेख है कि वह पिछले कुछ महीनों में दूसरी बार पैरोल पर बाहर आया है।
बस फिर क्या था… जनता ने इस खबर और कार्टून को जोड़कर नया व्यंग्य गढ़ दिया। अब लोग कल्पना कर रहे हैं कि जेलर खुद राम रहीम को जेल की चाबी सौंपते हुए कह रहा है —
“महाराज, ये चाबी आप अपने पास ही रख लीजिए…
बार-बार गेट खोलने की औपचारिकता में हमारा भी समय बच जाएगा!”
अखबार की खबर पढ़ने वालों का कहना है कि अब जेल कम और “सरकारी गेस्ट हाउस” ज्यादा लगने लगी है, जहाँ आने-जाने की सुविधा लगभग नियमित हो चुकी है।
व्यंग्यकारों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया कि यदि यही व्यवस्था रही, तो जल्द ही जेलों में नई योजनाएं शुरू हो सकती हैं —“पैरोल प्रीमियम कार्ड” “वीआईपी एंट्री पास”
“हर पांचवीं पैरोल पर एक मुफ्त”
उधर आम जनता सोच रही है कि कानून की किताब में शायद दो संस्करण छपते होंगे —
एक आम लोगों के लिए और दूसरा “विशेष सुविधाधारी” लोगों के लिए।
कार्टून और अखबार में छपी खबर को मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है —
क्या जेल अब सजा काटने की जगह रह गई है, या फिर प्रभावशाली लोगों के लिए सिर्फ एक “औपचारिक पता” बनकर रह गई है?
फिलहाल सोशल मीडिया पर यही तंज सबसे ज्यादा वायरल हो रहा है —
“अब जेलर को ताला रखने की जरूरत नहीं…
चाबी तो स्थायी रूप से मेहमान के पास ही है!”

