जगदीश पोरवाल
राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर राज्य सरकार की “तैयारी” वैसी ही दिख रही है, जैसी अमूमन बोर्ड परीक्षा से एक रात पहले किसी बैकबेंचर छात्र की होती है। माननीय हाई कोर्ट ने साफ़ शब्दों में कह दिया है कि “31 जुलाई तक चुनाव कराइए!” लेकिन सरकार के कानों पर जूं रेंगना तो दूर, वहाँ तो ‘नो सिग्नल’ का बोर्ड लटका हुआ है।
सूत्रों (और इस तीखे कार्टून) की मानें तो प्रशासनिक गलियारों में चुनाव का नाम सुनते ही अधिकारियों को पसीना और नेताओं को ‘माहौल ठीक न होने’ की गंभीर बीमारी घेर लेती है। जब सचिवालय के किसी कमरे से आवाज आती है:
“तैयारी भी नहीं, माहौल भी ठीक नहीं… चुनाव कैसे होंगे…”
तो तुरंत अंदर से एक बेहद तसल्लीबख्श, अनुभवी और ‘ढीठ’ किस्म का जवाब आता है:
“कोई बात नहीं, एक फटकार और सही…”
फटकार: सरकार की नई इम्यूनिटी बूस्टर
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने अब हाई कोर्ट की फटकारों को “डांट” की तरह नहीं, बल्कि “मल्टीविटामिन” की तरह लेना शुरू कर दिया है। ‘एक और सही’ वाली इस दार्शनिक सोच से यह साफ़ है कि सरकार का आत्मबल इस समय सातवें आसमान पर है। जब तक कोर्ट की अगली फटकार नहीं आती, तब तक “नो टेंशन, नो वर्क” के सिद्धांत पर अमल जारी रहेगा।
’तारीख पे तारीख’ बनाम ‘फटकार पे फटकार’
31 जुलाई की डेडलाइन तो कोर्ट ने दे दी है, लेकिन जनता अब यह देखने के लिए उत्सुक है कि सरकार चुनाव की घोषणा पहले करती है या कोर्ट से एक और शानदार ‘फटकार’ का शतक पूरा करती है। फिलहाल, जनता वोटिंग मशीन की धूल झाड़ने का इंतजार कर रही है, और सरकार ‘फटकार’ झेलने के लिए अपने कान मजबूत कर रही है।
कार्टूनिस्ट अशोक का सीधा संदेश: सरकारें बदल जाती हैं, तारीखें बदल जाती हैं, लेकिन ‘काम टालने और फटकार खाने’ का सरकारी मिजाज कभी नहीं बदलता!

