मामला 31 जुलाई तक पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराने का
जगदीश पोरवाल
राजस्थान सरकार पिछले कई महीनों से जिस ‘चुनावी भूत’ से बचने के लिए लगातार बहानेबाज़ी की चादर ओढ़ रही थी, उसे राजस्थान हाई कोर्ट ने एक ही झटके में खींच दिया है। सरकार पूरी शिद्दत और निष्ठा के साथ पंचायत और नगर निकाय चुनावों को ठंडे बस्ते में डालने की जुगत में लगी थी। तर्क भी ऐसे-ऐसे तराशे गए कि सुनने वाला भी भावुक हो जाए—कहा गया कि ‘साहब, भयंकर गर्मी है, टीचरों की ड्यूटी लगी है, खेती-बाड़ी का काम चल रहा है और सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र कि हम तो “वन स्टेट, वन इलेक्शन” के महान सपने को सच करना चाहते हैं!’
इधर राज्य चुनाव आयोग ने भी सरकार की हाँ में हाँ मिलाते हुए अर्जी लगा दी कि जब तक ओबीसी (OBC) रिजर्वेशन की रिपोर्ट नहीं आती, तब तक पत्ता भी नहीं हिल सकता।
परंतु, हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने सरकार के इन तमाम “चुनावी हीटस्ट्रोक” वाले बहानों पर सीधे कानूनी पानी फेर दिया। कोर्ट का सीधा फरमान आया—“31 जुलाई तक हर हाल में चुनाव कराएं और ओबीसी कमीशन 20 जून तक अपनी रिपोर्ट टेबल पर रखे।”
कार्टूनिस्ट अशोक का तीखा तीर: ‘अजी पसीने गर्मी से नहीं…’
इस पूरे सियासी ड्रामे को कार्टूनिस्ट अशोक ने एक ही फ्रेम में बखूबी समेट दिया है। जहाँ पूरा प्रदेश सूरज की तपिश से बेहाल है, वहीं चुनावी समर में उतरने के नाम से नेताओं और चुनाव आयोग के हुक्मरानों को जो पसीना छूट रहा है, वह मौसम विभाग की नहीं बल्कि न्यायिक विभाग की मेहरबानी है।
“अजी पसीने गर्मी से नहीं… आदेश से छूट रहे हैं…” व्यंग्यचित्र साफ बयां करता है कि चुनाव आयोग का बोर्ड थामे अधिकारी और सफेद कुर्ते वाले माननीयों के चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई हैं। हाईकोर्ट के 31 जुलाई वाले आदेश की कॉपी हाथ में आते ही ऐसा लगा है मानो किसी ने जलती गर्मी में ‘तुरंत दौड़ने’ का फरमान सुना दिया हो।
अब आगे कौन सा बहाना ढूंढेगी सरकार?
अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि दिसंबर तक का समय मांगने वाली सरकार के पास जब सिर्फ जुलाई तक की मोहलत बची है, तो पिटारे से अगला कौन सा नायाब बहाना निकलेगा?
क्या अब यह दलील आएगी कि ‘मानसून आने वाला है और छाते कम पड़ गए हैं’?
जनता भले ही गर्मी से परेशान हो, लेकिन लोकतंत्र के इस अखाड़े को सजता देखने के लिए वह पूरी तरह तैयार बैठी है!

