जगदीश पोरवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से की गई ‘ईंधन बचाओ’ की अपील के बाद देशभर में एक अनोखा ‘महाभियान’ देखने को मिल रहा है। मंत्री, मुख्यमंत्री और तमाम बड़े अधिकारी सुबह-सुबह ‘सादगी का लिबास’ पहनकर निकल पड़ते हैं। कोई साइकिल की घंटी बजा रहा है, कोई मेट्रो का टोकन ले रहा है, तो कोई सरकारी बस में खिड़की वाली सीट के लिए संघर्ष कर रहा है।
लेकिन कार्टूनिस्ट अशोक के ताज़ा कार्टून ने इस ‘क्रांति’ की पोल खोल दी है। कार्टून में दो आम नागरिक चर्चा कर रहे हैं।
पहला कहता है: “वाह, कोई साइकिल पर, कोई ऑटो में, कोई बस से, कोई ट्रेन से, कोई मेट्रो से…”
दूसरा तुरंत जोड़ता है: “हाँ, लेकिन पत्रकार, कैमरामैन, न्यूज़ चैनल, मीडिया वालों की भीड़ के साथ…”
जनता का सवाल
“नेता जी ने 2 किमी साइकिल चलाई, फोटो खिंचवाई, और वापस AC गाड़ी में बैठ गए। उधर 15 मीडिया गाड़ियाँ उनका पीछा करते करते आधा टंकी डीजल फूंक चुकी थीं। ये ईंधन बचाओ है या TRP बढ़ाओ?”
“अभियान सफल है। नेताओं का ईंधन तो बच ही रहा है। बस देश का कुल पेट्रोल-डीजल खपत 5% बढ़ गया है, वो अलग बात है।”
फिलहाल ‘ईंधन बचाओ अभियान’ देश का सबसे महंगा अभियान बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मीडिया वाले भी साइकिल से कवरेज करने लगें, तो शायद सच में कुछ ईंधन बच जाए। तब तक, कैमरा रोल करता रहेगा, और डीजल जलता रहेगा।
यह एक व्यंग्यात्मक रचना है जिसका उद्देश्य कार्टून में दर्शाए गए सामाजिक विरोधाभास पर टिप्पणी करना है।

