जगदीश पोरवाल
कार्टूनिस्ट अशोक का यह व्यंग्य चित्र वर्तमान समय में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं की मानसिक स्थिति, उनके आक्रोश और प्रशासनिक नीतियों के बीच की खाई को बेहद सजीवता से बयां करता है।
इस कार्टून की विस्तृत व्याख्या नीचे दिए गए मुख्य बिंदुओं के आधार पर की जा सकती है:
“छंटनी महोत्सव”
कार्टून का सबसे मुख्य और तीखा हिस्सा युवक के विचार में लिखा गया संवाद है:
“यह परीक्षा कम बेरोजगारों की छंटनी महोत्सव अधिक लग रहा है।”
यहाँ कार्टूनिस्ट ने ‘महोत्सव’ और ‘छंटनी’ जैसे दो विपरीत शब्दों का एक साथ इस्तेमाल करके व्यवस्था पर करारा तंज कसा है। आम तौर पर ‘महोत्सव’ खुशियों और उत्सव का प्रतीक होता है, लेकिन युवाओं के लिए यह परीक्षा एक ऐसा ‘उत्सव’ बन चुकी है जहाँ रोजगार मिलने की खुशी कम, और लाखों की भीड़ को रेस से बाहर (Filter out) करने का क्रूर प्रयास ज्यादा दिखाई देता है।
युवक के हाव-भाव और आक्रोश
चेहरे के भाव: कार्टून में दिखाए गए युवक के चेहरे पर अत्यधिक गुस्सा, हताशा और त्योरियां चढ़ी हुई हैं। उसकी आँखें और खिंचे हुए दांत यह दर्शाते हैं कि युवाओं का सब्र अब जवाब दे चुका है।
शारीरिक भाषा: युवक का एक हाथ हवा में उठा हुआ है (जैसे वह व्यवस्था से सवाल पूछ रहा हो या विरोध दर्ज करा रहा हो) और दूसरे हाथ में उसने अखबार थाम रखा है। यह इस बात का प्रतीक है कि नियमों की घोषणा होते ही युवाओं में तात्कालिक आक्रोश भड़क उठा है।
सिर से निकलता धुआं: सिर के पास बने गुस्से के गुबार (धुएं के बादल) यह दिखाते हैं कि बार-बार बदलते नियमों के कारण छात्र किस कदर मानसिक तनाव और ‘ब्रेन-ड्रेन’ की स्थिति से गुजर रहे हैं।
अखबार और नकारात्मक अंकन का डर
युवक के हाथ में जो अखबार है, उस पर लिखा है:
“नेगेटिव मार्किंग होगी, हर गलत सवाल पर एक तिहाई नंबर कटेंगे।”
यह हिस्सा सीधे तौर पर उस सरकारी फरमान को दिखाता है जो युवाओं की रातों की नींद उड़ा रहा है। कार्टूनिस्ट ने यहाँ यह दर्शाया है कि जो अखबार कभी नौकरियों की खुशखबरी लेकर आता था, वह अब केवल ‘कठिन नियमों’ और ‘अंक काटने’ की खबरें दे रहा है, जो छात्रों के भविष्य को और धुंधला बना देती हैं।
आम बेरोजगार का प्रतिनिधित्व
कार्टून में युवक को एक साधारण शर्ट और पैंट में दिखाया गया है, जो किसी भी कोचिंग जाने वाले या किराए के कमरे में रहकर पढ़ने वाले एक औसत मध्यमवर्गीय/ग्रामीण छात्र का प्रतिनिधित्व करता है। नीचे की ओर किया गया ‘अशोक’ का हस्ताक्षर इस बात की पुष्टि करता है कि यह कलाकृति समाज के सबसे संवेदनशील मुद्दे पर आम जनता की आवाज बन कर उभरी है।
कुल मिलाकर, अशोक का यह कार्टून केवल एक रेखाचित्र नहीं है, बल्कि यह राजस्थान CET (समान पात्रता परीक्षा) के नाम पर होने वाले अंतहीन बदलावों के खिलाफ युवाओं का एक ‘मौन प्रतिवाद’ है। यह कार्टून दिखाता है कि जब नीतियां केवल ‘भीड़ कम करने’ के उद्देश्य से बनाई जाती हैं, तो वे जन-कल्याणकारी न लगकर युवाओं को अपने ही खिलाफ एक साजिश जैसी प्रतीत होने लगती हैं।

