देश में प्रतियोगी परीक्षाएँ अब कम और “लॉटरी सिस्टम” ज्यादा लगने लगी हैं। छात्र सालों तक किताबों में सिर खपाते रहें, माता-पिता खेत बेचकर कोचिंग करवाते रहें, लेकिन असली परीक्षा तो उन मगरमच्छों की होती है जो एसी कमरों में बैठकर तय करते हैं कि इस बार पेपर कितने करोड़ में बिकेगा।
हर बार वही कहानी…पेपर लीक होता है, सरकार कहती है — “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।”पुलिस दो-चार छोटे दलाल पकड़कर फोटो खिंचवा लेती है, टीवी चैनलों पर “बड़ी कार्रवाई” की ब्रेकिंग चल जाती है और जनता समझ जाती है कि मगरमच्छ फिर तालाब में गोता लगाकर बच निकले।
बेचारा छात्र सोचता है कि सफलता का रास्ता मेहनत, लगन और ईमानदारी से होकर जाता है। लेकिन सिस्टम उसे बार-बार समझा रहा है कि बेटा, “नेटवर्किंग” और “सेटिंग” का चैप्टर पढ़े बिना प्रतियोगी परीक्षा पास करना कठिन है।आज हालत यह है कि परीक्षा से ज्यादा भरोसा व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर हो गया है। बच्चे एडमिट कार्ड से पहले पूछते हैं — “भैया, पेपर आउट तो नहीं हुआ?”कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई कम और “पेपर सुरक्षित रहेगा या नहीं” की चर्चा ज्यादा होती है।सरकारें भी कमाल करती हैं।
हर पेपर लीक के बाद जांच समिति ऐसे बनती है जैसे देश में कोई ऐतिहासिक खोज होने वाली हो। कुछ महीने फाइलें घूमती हैं, बयान आते हैं, फिर मामला ठंडा… और उधर नया पेपर लीक तैयार।
असल में शिक्षा व्यवस्था अब परीक्षा कम और व्यवसाय ज्यादा बन चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि छात्र पसीना बहाता है और मगरमच्छ मलाई खाते हैं।यदि सच में सुधार करना है तो सिर्फ छोटी मछलियाँ पकड़ने से काम नहीं चलेगा। उन बड़े मगरमच्छों तक पहुँचना होगा जो सत्ता, पैसे और रसूख के दम पर युवाओं के भविष्य की बोली लगा रहे हैं। वरना आने वाली पीढ़ी किताबों में “ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है” पढ़ेगी और बाहर निकलते ही देखेगी कि असली नीति तो “पेपर पहले, परीक्षा बाद में” बन चुकी है।

