श
जगदीश पोरवाल
राजस्थान की राजनीति में इन दिनों गजब का ‘आउटसोर्सिंग’ मॉडल देखने को मिल रहा है। विपक्ष, जो आमतौर पर सड़क पर पसीना बहाने के लिए जाना जाता है, इन दिनों ‘वर्क फ्रॉम होम’ मोड में है। वजह? क्योंकि सरकार को घेरने का जो काम कांग्रेस को करना चाहिए था, उसकी ‘सुपारी’ खुद सत्ताधारी दल के वैचारिक परिवार (ABRSM) ने उठा ली है।
कार्टूनिस्ट का व्यंग्य:विपक्ष की ‘छट्टी’, RSS की ‘ड्यूटी’
हालिया घटनाक्रम पर कार्टूनिस्ट अशोक का एक स्केच सोशल मीडिया पर खूब गोते लगा रहा है। कार्टून में एक नेताजी (जिनकी वेशभूषा और टोपी विपक्ष की ओर इशारा कर रही है) हाथ में अखबार थामे मुस्कुरा रहे हैं। सामने दीवार पर RSS समर्थित शिक्षक संगठन के धरने का लंबा-चौड़ा कैलेंडर टंगा है। नेताजी गदगद होकर कह रहे हैं— “वाह! जो काम हमें करना चाहिए, ये तो इनके ही कर रहे हैं!”
वाकई, जब घर के लोग ही थाली लेकर ‘अपनों’ की नजर उतारने (विरोध करने) सड़क पर उतर आएं, तो पड़ोसियों (विपक्ष) का खुश होना लाजिमी है ।
महासंघ का आरोप है की इस सरकार से शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी तीनों परेशान हैं ।अधिकारियों की ‘हठधर्मिता’ या सरकार की ‘घुट्टी’?शिक्षक संगठन का आरोप है कि शिक्षा विभाग में ‘नवाचार’ के नाम पर ऐसा रायता फैलाया गया है कि शिक्षक अब पढ़ाने के बजाय ‘शेड्यूल’ समझने में ही लगे हैं। संगठन ने साफ कह दिया है कि अधिकारियों की ‘हठधर्मिता’ ने विभाग का बंटाधार कर दिया है।
अब इसे लोकतंत्र की खूबसूरती कहें या ‘घर का भेदी लंका ढाए’, लेकिन 14 मई से लेकर 10 जून तक होने वाले इस आंदोलन ने विपक्ष का काम इतना आसान कर दिया है कि उन्हें अब बस पॉपकॉर्न लेकर तमाशा देखना है।नया ‘सपोर्ट सिस्टम’राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राजस्थान में अब विपक्ष को धरने की अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जब तक ‘अपने ही सिक्के खोटे’ निकलते रहेंगे, तब तक विपक्ष को सिर्फ प्रेस नोट जारी करने और ‘ताली बजाने’ का ही श्रम करना होगा।
व्यंग्य का सार: भजनलाल सरकार के लिए फिलहाल स्थिति ‘इधर कुआँ, उधर खाई’ वाली है। अगर शिक्षकों की मांगें मानीं तो अधिकारियों का इक़बाल गिरेगा, और नहीं मानीं तो ‘संघ’ की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। उधर विपक्ष मंद-मंद मुस्कुरा रहा है, मानो कह रहा हो— “थैंक यू, आपने हमारा पेट्रोल और गला दोनों बचा लिया!”

