पेपर लीक का “वायरस” फिर एक्टिव!सत्ता बदली, सवाल वही… अब मगरमच्छों को कौन लगाएगा वैक्सीन?

जगदीश पोरवाल

राजस्थान में एक बार फिर पेपर लीक की आशंका ने राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के बीच हलचल मचा दी है। कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने ताज़ा व्यंग्य चित्र में इस पूरे मुद्दे पर तीखा कटाक्ष किया है।
कार्टून में एक युवक अखबार पढ़ते हुए कहता है— “पेपर लीक के वायरस फिर सक्रिय हो गए हैं!”
इस पर दूसरा व्यक्ति जवाब देता है— “अजी, मछलियों के वैक्सीन लगाने से क्या होगा, मगरमच्छों के तो हाथ ही नहीं लगाया!”

दरअसल, यह व्यंग्य सीधे उस राजनीतिक बहस पर चोट करता है, जिसमें पिछले कांग्रेस शासनकाल के दौरान लगातार हुए पेपर लीक मामलों को लेकर तत्कालीन विपक्ष भाजपा ने सरकार को जमकर घेरा था। उस समय भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाओं ने पूरे प्रशासनिक तंत्र की साख पर सवाल खड़े कर दिए थे। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाए थे कि बिना राजनीतिक संरक्षण के इतना बड़ा “पेपर उद्योग” चल ही नहीं सकता।
अब भाजपा शासन के ढाई वर्ष पूरे होने को हैं और अब तक सरकार खुद को “पेपर लीक मुक्त शासन” बताती रही है। लेकिन हाल ही में नीट परीक्षा में पेपर लीक की आशंका और एसओजी की जांच ने फिर से पुराने जख्म कुरेद दिए हैं। विपक्ष को भी अब वही सवाल पूछने का मौका मिल गया है, जो कभी भाजपा पूछा करती थी।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद पहलू वे लाखों छात्र हैं, जो दिन-रात मेहनत कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। कई युवा गांवों से दूर रहकर कोचिंग लेते हैं, परिवार अपनी जमा पूंजी खर्च करता है और छात्र अपनी नींद, आराम और खुशियां तक दांव पर लगा देते हैं। लेकिन जब पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं तो उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है।
ऐसे युवाओं पर निराशा और उदासी छा जाती है तथा उनका भविष्य अंधकारमय नजर आने लगता है। मेहनत करने वाले छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं, जबकि नकल और सिफारिश का खेल ईमानदार प्रतिभाओं का मनोबल तोड़ देता है।
व्यंग्य की सबसे खास बात यह है कि कार्टून यह संदेश देता है कि कार्रवाई अक्सर केवल “छोटी मछलियों” तक सीमित रह जाती है, जबकि असली “मगरमच्छ” व्यवस्था में सुरक्षित बने रहते हैं।
यानी बदलती सिर्फ सरकारें हैं, लेकिन “पेपर लीक वायरस” का इलाज आज भी अधूरा ही नजर आता है।

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