राजस्थान की राजनीति में फिर शुरू हुआ “कद, पद और घर वापसी” का मौसम!


जगदीश पोरवाल

राजस्थान की राजनीति इन दिनों बड़े दिलचस्प दौर से गुजर रही है। पांच राज्यों के चुनाव समाप्त होते ही अब प्रदेश में पंचायत और नगर निकाय चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है। ऐसे में दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के नेताओं में अचानक नई ऊर्जा का संचार हो गया है। कोई “घर वापसी” के सपने देख रहा है तो कोई अपने “कद और पद” में बढ़ोतरी की उम्मीद लगाए बैठा है।
कार्टूनिस्ट अशोक ने भी वर्तमान राजनीतिक माहौल पर ऐसा तंज कसा है कि नेता भी मुस्कुरा रहे हैं और कार्यकर्ता भी खूब चटकारे ले रहे हैं।

कांग्रेस में “दर्द” भी अपना, “दवा” भी अपनी!

पहले कार्टून में कांग्रेस कार्यालय के बाहर खड़े नेता बड़े भावुक अंदाज में कहते दिखाई दे रहे हैं —
“तुम्हीं ने दर्द दिया, तुम्हीं दवा देना…”

असल में यह दर्द उन नेताओं का है जिन्हें पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। लेकिन अब निकाय और पंचायत चुनाव नजदीक आते ही पार्टी को संगठन मजबूत करने की याद आ गई है। अनुशासन समिति फिर सक्रिय हो गई है और निष्कासित नेताओं की “घर वापसी” की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिन नेताओं की वापसी पर विचार हो रहा है उनमें
महेंद्रजीत सिंह मालवीय, खिलाड़ी लाल बैरवा, कांता भील, कैलाश मीणा, रामचंद्र सराधना और गोपाल गुर्जर जैसे नाम प्रमुख बताए जा रहे हैं।
अब कार्यकर्ता भी समझ नहीं पा रहे कि कल तक जिन्हें “अनुशासनहीन” बताया जा रहा था, वे अचानक संगठन की मजबूती के लिए इतने जरूरी कैसे हो गए!

भाजपा में “कद” बढ़ाने की होड़

उधर भाजपा खेमे में अलग ही उत्साह का माहौल है। दूसरे कार्टून में एक नेता दूसरे से कहते दिख रहे हैं —
“चुनाव नतीजों से प्रदेश के कई नेताओं का कद बढ़ गया है!”
इस पर दूसरा नेता तुरंत जवाब देता है —

अजी कद से प्रशंसा मिलती है केवल… पावर तो पद से ही मिलता है!”

बस यही आज की राजनीति का सबसे बड़ा दर्शन है। भाजपा के कई नेता, जिन्होंने पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के चुनाव में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाई थीं, अब उम्मीद लगाए बैठे हैं कि पार्टी उनके “काम” का इनाम देगी। कोई मंत्री पद का सपना देख रहा है तो कोई संगठन में बड़ी जिम्मेदारी का।
नेताओं को लग रहा है कि दिल्ली दरबार अब उनके “कद” को पहचान चुका है। हालांकि राजनीति के जानकारों का कहना है कि यहां केवल कद बढ़ने से काम नहीं चलता, असली ताकत तो “पद” मिलने के बाद ही महसूस होती है।

चुनाव से पहले सब अपने!

राजनीति का यह पुराना नियम फिर साबित होता दिख रहा है कि चुनाव आते ही दलों को अपने पुराने साथी याद आने लगते हैं। कल तक जो बागी थे, आज वे “अनुभवी नेता” बन गए हैं। और जो संगठन के लिए बाहर राज्यों में मेहनत कर आए हैं, वे अब अपनी मेहनत का राजनीतिक बोनस चाहते हैं।

प्रदेश की राजनीति फिलहाल “घर वापसी”, “कद वृद्धि” और “पद प्राप्ति” के त्रिकोण में घूम रही है। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में किसे पार्टी का प्यार मिलता है, किसे पद की पावर और किसे केवल आश्वासन की मिठाई।

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