अधिकारी संस्कृति और नेताओं की कमजोर होती पकड़ : स्वागत-सत्कार की मजबूरी या व्यवस्था की सच्चाई?




जगदीश पोरवाल

पिछले कुछ वर्षों से शहर में एक चर्चा लगातार जोर पकड़ रही है। जब भी कोई प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी नगर में पदस्थापित होकर आता है या स्थानांतरण पर जाता है, तब विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और दोनों दलों के नेताओं द्वारा उसका स्वागत-सत्कार किया जाता है। फूल-मालाएं पहनाई जाती हैं, सम्मान समारोह होते हैं और विदाई के समय प्रतीक चिन्ह तक भेंट किए जाते हैं।

इसी तरह शहर में होने वाले अधिकांश सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक आयोजनों में भी प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच पर स्थान दिया जाता है।
नैतिक दृष्टि से देखें तो यह परंपरा कई सवाल खड़े करती है, लेकिन इसके पीछे छिपी सामाजिक और राजनीतिक मजबूरियों को भी समझना जरूरी है।

आखिर लोग अधिकारियों की आवभगत क्यों करते हैं?

जो लोग अधिकारियों का स्वागत-सत्कार करते हैं, उनके मन में सामान्यतः यह भावना रहती है कि भविष्य में यदि संस्था या निजी स्तर पर कोई काम पड़े, तो संबंधित अधिकारी “सॉफ्ट कॉर्नर” रखते हुए सहयोग कर देगा।
यही सोच सत्ताधारी और विपक्ष दोनों दलों के नेताओं में भी दिखाई देती है। आम व्यक्ति जब किसी काम को लेकर नेता के पास जाता है, तो अक्सर उसे लंबा इंतजार, टालमटोल या आश्वासन ही मिलता है। अंततः नेता भी उसी अधिकारी को फोन या सिफारिश करता है, और यदि अधिकारी ने बात मान ली तो काम हो गया, अन्यथा मामला अधर में लटक जाता है।

नेताओं की सत्ता पांच साल की, अधिकारियों की लंबी

जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल अधिकतम पांच साल का होता है, जबकि अधिकारी वर्षों तक सेवा में रहते हैं। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन प्रशासनिक तंत्र स्थायी बना रहता है।
इसी कारण लोग नेताओं से ज्यादा अधिकारियों से संबंध मजबूत करने में रुचि लेने लगे हैं। एक बार अच्छे संबंध बन जाएं, तो अधिकारी भविष्य में कहीं भी पदस्थापित हो, संपर्क काम आ सकता है। यही कारण है कि समाज का प्रभावशाली और व्यावहारिक वर्ग अधिकारियों के साथ मधुर संबंध बनाए रखना अपनी आवश्यकता मानने लगा है।

व्यक्तिगत स्वागत नहीं ……विदाई समारोह होना चाहिए

किसी भी अधिकारी के स्थानांतरण होने पर व्यक्तिगत स्वागत सत्कार नहीं विदाई समारोह होना चाहिए बशर्तें है कि अधिकारी ने शहर के हित में अच्छा व रुका हुआ काम किया हो जिससे पूरे शहर की जनता को फायदा पहुंचा हो,कानून और व्यवस्था पर मजबूत पकड़ रखी हो, ऐसे काबिल अधिकारी का व्यक्तिगत स्वागत सत्कार के साथ साथ पूरे नगर को भावभीनी विदाई देनी चाहिए ।

सबसे बड़ी कमी :
स्थानीय नेतागिरी में प्रभाव का अभाव

जहां तक मेरा मानना है, इस पूरी स्थिति के पीछे सबसे बड़ी वजह स्थानीय नेताओं की कमजोर होती पकड़ और दबंगता का अभाव है। यह स्थिति केवल एक दल में नहीं, बल्कि दोनों प्रमुख दलों में समान रूप से देखने को मिलती है।
यदि जनता को यह भरोसा हो कि उसका जनप्रतिनिधि समय पर, प्रभावी और जिम्मेदारी के साथ काम करवा सकता है, तो लोगों को अधिकारियों के इर्द-गिर्द घूमने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होगी।

चिंतन का विषय:

यह सत्ताधारी दलों और बड़े नेताओं के लिए गंभीर चिंतन का विषय है कि सत्ता उनके हाथ में होने के बावजूद प्रभाव अधिकारियों का अधिक दिखाई देता है। आखिर क्यों समाज का शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग नेताओं से दूरी बनाकर अधिकारियों के संपर्क को प्राथमिकता देने लगा है?
आज स्थिति यह बनती जा रही है कि लोग अपने काम निकलवाने के लिए तीन रास्ते मानते हैं —
धन,
अधिकारियों से संपर्क,
और अंत में नेतागिरी।
यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए निश्चित रूप से विचारणीय स्थिति है।

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