राजनीति में “प्रमोशन” का अकाल, देवनानी निकले सबसे फुर्तीले!

जगदीश पोरवाल

राजस्थान की राजनीति इन दिनों एक अजीब दौर से गुजर रही है। सरकार बने ढाई साल का समय हो चुका, लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार, फेरबदल और राजनीतिक नियुक्तियों की फाइलें अब भी मानो किसी “वीआईपी वेटिंग रूम” में बैठी अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं। विधायक से लेकर पार्टी कार्यकर्ता तक सबकी निगाहें ऊपर टिकी हैं, लेकिन ऊपर से अब तक सिर्फ आश्वासन की बारिश हुई है, नियुक्तियों की नहीं।

इसी बीच विधानसभा अध्यक्ष डॉ. वासुदेव देवनानी ने विधानसभा सचिवालय के 52 कर्मचारियों को पदोन्नति देकर ऐसा संदेश दे दिया कि सत्ता के गलियारों में बैठे कई नेताओं के दिल पर सीधा व्यंग्य तीर जा लगा।
लोग कहने लगे—

भाई, सरकार में अगर किसी विभाग की फाइल सबसे तेज चल रही है तो वह विधानसभा सचिवालय ही है!”

प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक ने इसी राजनीतिक पीड़ा को अपने व्यंग्यात्मक कार्टून में शानदार ढंग से उकेरा है। कार्टून में एक तरफ विधायक हाथ में बैग लिए खड़े हैं और दूसरी तरफ वर्षों से पार्टी का झंडा ढो रहे कार्यकर्ता। दोनों के चेहरे पर इंतजार की थकान साफ दिखाई दे रही है।

विधायक कह रहे हैं—
“लगता है हमारा प्रमोशन तो पांच साल पूरे होने पर ही होगा…”
तो कार्यकर्ता दर्द भरी मुस्कान के साथ जोड़ता है—
“और हमारी राजनीतिक नियुक्तियां शायद अगले चुनाव के घोषणा पत्र में मिलेंगी!”

असल में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही प्रदेशभर में हजारों कार्यकर्ता बोर्ड, निगम, आयोग और सलाहकार समितियों में नियुक्तियों की उम्मीद लगाए बैठे हैं। कई नेताओं ने तो अपने समर्थकों को पहले ही “बस कुछ दिनों की बात है” कहकर मिठाई तक खिलवा दी थी। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि वही समर्थक पूछ रहे हैं—

नेता जी, मिठाई तो खा ली… अब नियुक्ति कब आएगी?”
राजनीतिक गलियारों में अब यह कहावत खूब फिट बैठ रही है—

घर का पुत कुंवारा डोले और जजमाना के फेरा।”
व्यंग्य यह भी है कि विधानसभा सचिवालय में कर्मचारियों को पदोन्नति मिल गई, लेकिन राजनीति में “प्रमोशन” पाने वाले अभी भी लाइन में खड़े हैं। कुछ विधायक मंत्री बनने की आस में हैं, तो कुछ पुराने नेता राजनीतिक पुनर्वास की प्रतीक्षा में। उधर कार्यकर्ता इतने धैर्यवान हो चुके हैं कि अब नियुक्ति की चर्चा सुनकर भी सिर्फ मुस्कुरा देते हैं।

सत्ता के जानकार कहते हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार का गणित इतना उलझ चुका है कि कोई भी फैसला लेते ही किसी न किसी क्षेत्र, जाति या गुट की नाराजगी सामने आ जाती है। शायद यही कारण है कि फाइलें चलने से ज्यादा “विचाराधीन” लिखकर रखी जा रही हैं।

फिलहाल हालात ऐसे हैं कि राजस्थान की राजनीति में सबसे खुश अगर कोई दिखाई दे रहा है, तो वे विधानसभा सचिवालय के वे 52 कर्मचारी हैं जिन्हें समय पर पदोन्नति मिल गई। बाकी नेता और कार्यकर्ता तो अभी भी उम्मीद की कुर्सी पर बैठे यही सोच रहे हैं—
“कहीं हमारा नंबर आते-आते अगला चुनाव ही न आ जाए!”

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