अब ‘स्वदेशी’ ज़ुबान पर चढ़ेगा ‘विदेशी’ तड़का !

जगदीश पोरवाल

एक तरफ देशभर में “वोकल फॉर लोकल” और “स्वदेशी अपनाओ” के नारे बुलंद हो रहे हैं, तो दूसरी ओर राजस्थान सरकार ने युवाओं को “ग्लोबल” बनाने के लिए सरकारी कॉलेजों में विदेशी भाषाओं की पढ़ाई शुरू करने का फैसला कर लिया है। अब कॉलेज परिसरों में हिंदी और राजस्थानी के साथ-साथ फ्रेंच, जर्मन, जापानी और कोरियन जैसी भाषाओं की गूंज भी सुनाई देगी।

नारा स्वदेशी… लेकिन भाषा विदेशी!

प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक ने इसी विरोधाभास पर चुटीला व्यंग्य किया है। कार्टून में एक आम नागरिक हाथ में “विदेशी भाषा” सिखाने वाला सरकारी आदेश लिए खड़ा है और सामने लिखे “स्वदेशी अपनाओ” के बोर्ड की ओर देखकर सवाल करता है—“तो फिर वोकल फॉर लोकल का क्या होगा?”जवाब में सत्ता का मुस्कुराता चेहरा बड़े आराम से कहता है—“लोकल सोचो… विदेशी बोलो… और मस्त रहो!”यानी अब देशभक्ति का नया संस्करण तैयार है—दिल हिंदुस्तानी, लेकिन ज़ुबान जापानी!

क्या है पूरा मामला?

राज्य सरकार ने हाल ही में “विदेशी भाषा संचार कौशल” कार्यक्रम के तहत एक एमओयू (MoU) किया है। इसके अंतर्गत सरकारी कॉलेजों में सात विदेशी भाषाओं के सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किए जाएंगे।

शामिल भाषाएँ:

फ्रेंच,जर्मन,रशियन,स्पेनिश,इटालियन,कोरियन,जापानी

सरकार का तर्क:

सरकार का कहना है कि इससे युवाओं को पर्यटन, अंतरराष्ट्रीय रोजगार और वैश्विक अवसरों में फायदा मिलेगा। साथ ही राजस्थान की लोककथाओं और संस्कृति को विदेशी भाषाओं में दुनिया तक पहुंचाया जा सकेगा।

यानी अब संभव है कि“पृथ्वीराज चौहान” की वीरगाथा फ्रेंच में सुनाई जाए और राजस्थानी लोकगीत जापानी उच्चारण में गूंजें!

व्यंग्य यहीं से जन्म लेता है…आम आदमी अब इसी दुविधा में है कि यदि हाथ में “मेड इन इंडिया” का सामान हो और बातचीत फ्रेंच में हो, तो क्या यही “आत्मनिर्भर भारत”

का नया मॉडल है? सच्चाई यह भी है कि जब तक युवाओं को अपनी भाषा में पर्याप्त रोजगार नहीं मिलेगा, तब तक उन्हें अवसरों की तलाश में विदेशी भाषाओं का सहारा लेना ही पड़ेगा।

कार्टूनिस्ट अशोक का व्यंग्य

कार्टूनिस्ट अशोक का व्यंग्य इसी कड़वी हकीकत पर चोट करता है कि नारों में भले “स्वदेशी” चमकता हो, लेकिन करियर की चाबी आज भी “विदेशी” ताले में ही तलाश की जा रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि राजस्थान का युवा जापानी और जर्मन बोलकर राजस्थान के “लोकल” पर्यटन को कितना “वोकल” बना पाता है, या फिर यह योजना भी सरकारी नारों की भीड़ में एक और “विदेशी तड़का” बनकर रह जाएगी।

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