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भवानीमंडी। (जगदीश पोरवाल)
राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित व्यापारिक नगर भवानीमंडी 3 मई 2026 को अपना 116वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। कार्यक्रम की रूपरेखा तय है—पुरानी सब्जी मंडी स्थित झालावाड़ के पूर्व महाराजा भवानी सिंह जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण होगा, कुछ नेता जुटेंगे, कुछ संगठन आएंगे और औपचारिकता पूरी हो जाएगी। लेकिन आज प्रश्न यह नहीं है कि कार्यक्रम कैसे होगा, प्रश्न यह है कि ‘शताब्दी वर्ष’ (2010) जैसा उत्साह अब कहीं खो क्यों गया है?
16 साल और वही सीमित दायरा: विस्तार की दरकार
वर्ष 2010 में जब भवानीमंडी ने अपने गौरवमयी 100 वर्ष पूरे किए थे, तब ‘भवानीमंडी स्थापना दिवस समारोह समिति’ का गठन एक बड़े संकल्प के साथ हुआ था। ऐतिहासिक आयोजन हुए, लेकिन समय के साथ यह समिति और आयोजन केवल एक रस्म बनकर रह गए हैं। आज 16 साल बीत जाने के बाद भी समिति का विस्तार न होना एक गंभीर चिंतन का विषय है। क्या शहर के अन्य प्रबुद्ध नागरिक इस उत्सव से जुड़ना नहीं चाहते, या उन्हें जोड़ने की कोशिशें कम रह गईं?
युवा जोश और बुजुर्गों का मार्गदर्शन: समय की मांग शहर की उन्नति के लिए एक स्थाई और समावेशी समिति का होना अनिवार्य है। आवश्यकता इस बात की है कि:
शहर के कर्मठ और लगनशील युवाओं को कमान सौंपी जाए।
अनुभवी और वरिष्ठ सदस्य मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं।
भले ही वर्ष भर आयोजन न हों, लेकिन 3 मई का दिन ऐसा हो जो पूरे शहर के लिए ‘सकारात्मक और शिक्षाप्रद’ संदेश दे।
‘अपनी माटी’ के लालों को पुकार रहा है भवानीमंडी
स्थापना दिवस केवल माल्यार्पण तक सीमित न रहे, बल्कि यह एक ‘पुनर्मिलन उत्सव’ बने। भवानीमंडी की माटी में जन्मे, पले-बढ़े वे युवा और बुजुर्ग जो आज देश-विदेश में उच्च पदों पर आसीन हैं, उन्हें इस दिन विशेष रूप से आमंत्रित किया जाना चाहिए।
हमारी वे बहन-बेटियां, जो शादी के बाद दूसरे शहरों में बस गई हैं, उन्हें भी इस दिन अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलना चाहिए। शादी-ब्याह में तो सबका आना-जाना लगा रहता है, लेकिन यदि 3 मई को पूरा ‘भवानीमंडी परिवार’ एक साथ जुटे, तो पुरानी यादें भी ताजा होंगी और शहर के विकास के लिए नए विचार भी साझा होंगे।
एक त्यौहार जैसा अहसास
भवानीमंडी के नागरिकों के लिए 3 मई से बड़ा कोई त्यौहार नहीं हो सकता। यदि हम सब मिलजुलकर अपनी माटी के प्रति लगाव को जिंदा कर सकें, तो यही महाराजा भवानी सिंह जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अब समय है आत्ममंथन का—ताकि भवानीमंडी का स्थापना दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख न रहकर, जन-जन का उत्सव बन सके।

