कमर्शियल गैस के दाम ‘डबल’, जनता की जेब में ‘ट्रबल’:



जगदीश पोरवाल

कल तक जो सिलेंडर 1500 रुपये की ‘औकात’ में रहकर मध्यमवर्गीय बजट से हाथ मिलाता था, मई 2026 आते-आते उसने अपनी कीमत 3000 के पार पहुँचाकर सीधे ‘एलीट क्लास’ की क्लब मेंबरशिप ले ली है।कमर्शियल गैस सिलेंडरों के बढे हुए दामों पर कार्टूनिस्ट ने करारा व्यंग्य किया ।

सिलेंडर के ‘नखरे’ और जनता के ‘आंसू’

1 मई को हुई 993 रुपये की इस ऐतिहासिक ‘बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में एक सिलेंडर की कीमत 3071.50 रुपये हो गई है। अब होटल और ढाबे वालों की हालत ऐसी है कि वे ग्राहक को मेन्यू कार्ड दिखाने से पहले उसका ‘सिबिल स्कोर’ चेक करना चाह रहे हैं।

कार्टूनिस्ट अशोक ने बढे हुए दामों पर नमक छिड़का!

प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक ने भी इस पर ऐसा नमक छिड़का है कि घाव गहरे हो गए हैं। उनके कार्टून में सिलेंडर पूरी ठसक के साथ कह रहा है— “वाह! बढ़ाते ही रहो हमारे दाम, अब देखो हम महंगाई का कैसा तांडव करते हैं!” कार्टून में गैस कंपनी के बाबू का चेहरा देखकर लग रहा है जैसे उन्होंने गैस नहीं, सीधा जनता का खून पंप किया हो।

महंगाई का ‘बुलेट ट्रेन’ मॉडल

आम जनता के लिए अब कुछ बड़े दार्शनिक सवाल खड़े हो गए हैं:
रोटी खाना सस्ता है या उसे बनाना?
पेट की आग बुझाना आसान है या सिलेंडर की?
विशेषज्ञ कह रहे हैं कि “अंतरराष्ट्रीय बाजार” में आग लगी है, इसलिए यहाँ धुआं उठ रहा है। पर आम आदमी का तर्क सीधा है— ग्लोबल इकोनॉमी जाए तेल लेने, यहाँ तो जेब की इकोनॉमी ‘कोमा’ में जा चुकी है। ### बाजार का नया गणित:
व्यापारियों की मानें तो अब समोसे के अंदर आलू कम और ‘महंगाई का दर्द’ ज्यादा भरा मिलेगा। जैसे ही गैस महंगी होती है, सब्जी, दूध और परिवहन के दाम भी अपनी जंजीरें तोड़कर भागने लगते हैं।
बॉटम लाइन: शहर के चौराहों पर अब चर्चा है कि देश में और कुछ बढ़े न बढ़े, महंगाई का ‘बुलेट ट्रेन मॉडल’ सुपरफास्ट ट्रैक पर है। आम आदमी अब हर महीने अपने बजट का ‘पोस्टमार्टम’ नहीं कर रहा, बल्कि सीधे ‘अंतिम संस्कार’ कर रहा है।



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