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जगदीश पोरवाल
आज 1 मई है। कैलेंडर कह रहा है कि यह ‘मजदूर दिवस’ है, लेकिन सोशल मीडिया की गलियों में इसे ‘महोत्सव-ए-कैमरा’ के रूप में मनाया जा रहा है। सुबह से ही सफेदपोश गलियारों में हलचल है—इस्तरी किए हुए कुर्ते पहने जा रहे हैं, चेहरे पर कृत्रिम ‘गंभीर चिंता’ के भाव सेट किए जा रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण, फोटोग्राफरों को ‘एंगल’ समझा दिए गए हैं।
डबल मजदूरी: पसीने की नहीं, पोज देने की!
कार्टूनिस्ट अशोक के हालिया चित्र ने उस कड़वी हकीकत पर मुहर लगा दी है, जिसे हम ‘विकास’ के चश्मे से नहीं देख पा रहे थे। एक मजदूर अपनी पत्नी को खुशखबरी दे रहा है कि आज काम नहीं करना है, बस नेताओं के साथ फोटो खिंचवानी है क्योंकि उसकी ‘मुस्कान’ की कीमत आज उसकी ‘मशक्कत’ से ज्यादा है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि देश में अब दो तरह की दिहाड़ी चलती है:
- असली मजदूरी: जो पसीने से ईंटें जोड़ती है।
- राजनीतिक मजदूरी: जो मजदूर के कंधे पर हाथ रखकर वोट बटोरती है।
संवेदनाओं का ‘वातानुकूलित’ विसर्जन
आज के दिन की दिनचर्या फिक्स है। नेता जी पधारेंगे, धूल भरी बस्ती में दो मिनट के लिए अपना कीमती वक्त ‘दान’ करेंगे। जैसे ही कैमरे की फ्लैश चमकेगी, मजदूर अचानक ‘राष्ट्र निर्माता’ बन जाएगा। फिर मालाएं पहनाई जाएंगी, “गरीबों का मसीहा” वाले नारे लगेंगे और कार्यक्रम खत्म होते ही नेता जी अपनी लग्जरी गाड़ी के AC को 16 डिग्री पर सेट कर निकल लेंगे।
पीछे रह जाएगा वही मजदूर, जिसे अब भी समझ नहीं आ रहा कि जिस ‘उज्ज्वल भविष्य’ का जिक्र भाषण में हुआ, उसका पता उसके घर तक क्यों नहीं पहुँचता।
फाइलों का तिलिस्म और हकीकत का गड्ढा
विडंबना का आलम यह है कि कागजों पर मजदूर के पास पक्का मकान है, बीमा है और बच्चों के लिए शिक्षा भी। लेकिन असलियत में, उसके पास सिर्फ एक ‘अधूरी थाली’ और एक ‘पुरानी बनियान’ है। सरकार के पास आंकड़ों का अंबार है, पर मजदूर के पास सिर्फ कल की चिंता।
आज का मुख्य व्यंग्य: > मजदूर दिवस अब अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि ‘इमेज मैनेजमेंट’ का जरिया बन गया है। अब संघर्ष सड़कों पर नहीं, ट्विटर (X) के थ्रेड्स में होता है।
देश के विकास की रीढ़ कहे जाने वाले इन हाथों को आज काम की नहीं, सम्मान की जरूरत थी। पर अफ़सोस, उन्हें सम्मान के नाम पर सिर्फ एक ‘फोटो’ थमा दी गई। अंत में सच्चाई यही है कि मजदूर आज भी वहीं खड़ा है, बस उसके बगल में खड़ा ‘चेहरा’ हर साल बदल जाता है।

