जगदीश पोरवाल
भारतीय राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, लेकिन राजस्थान की राजनीति के ताज़ा घटनाक्रम ने एक नया मुहावरा गढ़ दिया है—”दुश्मन का ‘बड़बोलापन’ ही अपनी संजीवनी है।”
अशोक जी के कार्टून में जो मुस्कुराहट एक कांग्रेसी नेता के चेहरे पर है, वह वैसी ही है जैसी किसी प्यासे को तपती मरुधरा में अचानक ‘कोका-कोला’ मिल जाने पर होती है। भाजपा के प्रदेश प्रभारी डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने शायद सोचा होगा कि वे सचिन पायलट को ‘बहुरूपिया’ कहकर अपनी पार्टी के नंबर बढ़ा लेंगे, लेकिन राजनीति की पिच पर वे अपनी ही टीम के खिलाफ ‘नो-बॉल’ फेंक बैठे।
भाजपा के बयान ने कांग्रेसी गुटबाजी को ऑक्सीजन दी
कल तक जो कांग्रेसी नेता एक-दूसरे की शक्ल देखकर रास्ता बदल लिया करते थे, आज वे कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। इसे कहते हैं ‘अग्रवाल इफ़ेक्ट’। जिस ‘अग्रवाल’ नाम से लोग व्यापार समझते हैं, यहाँ उसी नाम ने कांग्रेस को एकजुटता का नया व्यापार समझा दिया। पायलट के सम्मान में जो सुर निकले हैं, उनमें अब गुटबाजी की खनक नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ ललकार सुनाई दे रही है।
भाजपा का प्रदेश प्रभारी कांग्रेस का स्टार प्रचारक या संकटमोचक?
कार्टून का पंच बिल्कुल सटीक है—“आपके प्रदेश प्रभारी तो हमारे स्टार प्रचारक निकले।” वाकई, जब घर में झगड़ा हो और पड़ोसी आकर गाली दे जाए, तो घरवाले अपने झगड़े भूलकर पहले पड़ोसी को ठीक करते हैं। अग्रवाल जी ने अनजाने में वही काम किया है जो राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शायद राजस्थान में उतनी मजबूती से नहीं कर पाई थी। उन्होंने एक ही बयान से बिखरी हुई कांग्रेस में वह ‘संजीवनी’ फूंक दी, जिसकी तलाश में पार्टी आलाकमान बरसों से माथापच्ची कर रहा था।
राजनीति में कब, कहां और क्या बोलना यह भी एक कला है
राजनीति में बोलना एक कला है, लेकिन कब चुप रहना है—यह ‘महाकला’ है। फिलहाल राजस्थान कांग्रेस भाजपा प्रभारी का आभार व्यक्त कर रही होगी। पुतले तो फूँके जा रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर कांग्रेसी मुस्कुरा रहे हैं कि चलो, इसी बहाने हाथ (कांग्रेस का चुनाव चिह्न) तो एक साथ ऊपर उठे!

