जगदीश पोरवाल
राजनीति में झाड़ू का काम गंदगी साफ करना होता है, लेकिन आम आदमी पार्टी के गलियारों में आजकल यह झाड़ू कुछ ‘ज्यादा ही’ सफाई कर रही है। शुक्रवार को राज्यसभा के 7 सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या पार्टी का चुनाव चिन्ह ही उसके पतन का कारण बन गया है?
‘आप’ से ‘मैं’ तक का सफर: झाड़ू हाथ में, सांसद बाहर!
प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक के कार्टून ने जिस ‘एक दल, एक नेता’ की आशंका जताई थी, वह अब धरातल पर उतरती दिख रही है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल अब उसी झाड़ू को लेकर मुस्तैद खड़े हैं जिससे कभी भ्रष्टाचार साफ करने की कसमें खाई गई थीं।
लेकिन ट्विस्ट ये है कि अब झाड़ू का रुख बाहर की गंदगी की तरफ नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के सांसदों की तरफ है। ऐसा लगता है मानो संयोजक जी झाड़ू फटकारते हुए कह रहे हों— “सब निकलो यहाँ से, यहाँ अब कोई ‘आप’ (सामूहिकता) नहीं रहेगा, यहाँ अब सिर्फ ‘मैं’ रहूँगा!”
व्यंग्य का पंच: “कभी झाड़ू से व्यवस्था बदलनी थी, आज उसी झाड़ू से सदस्य बदले जा रहे हैं। लगता है झाड़ू ने ‘सफाई’ शब्द को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है!”
जो सात थे अब ‘आप’ के नहीं हुए, और हम ‘सात’ साथ नहीं!
10 में से 7 सांसदों का जाना महज एक संख्या नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। इन सांसदों ने साफ कर दिया कि वे “हम आपके हैं कौन?” वाली फिल्म के क्लाइमेक्स पर पहुंच चुके हैं।
आज के घटनाक्रम की कुछ ‘कड़वी’ सुर्खियाँ:
- नया मैनुअल: झाड़ू चलाने के नए नियम—पहले बाहर वालों को हटाओ, फिर अपनों को भगाओ, अंत में अकेले कमरे में झाड़ू लगाओ।
- व्याकरण का संकट: राजनीति की पाठशाला में अब पढ़ाया जाएगा कि ‘आप’ बहुवचन नहीं, बल्कि एक ‘व्यक्ति विशेष’ का सर्वनाम है।
- भविष्यवाणी: अशोक जी के कार्टून वाले कौवे भी अब कांव-कांव की जगह ‘एक नेता, एक दल’ का जाप करने लगे हैं।
झाड़ू घर की बरकत लाती है ?
कहते हैं झाड़ू घर की बरकत लाती है, लेकिन यहाँ तो झाड़ू ‘बरकत’ को ही बुहार कर पड़ोसियों के घर (भाजपा) पहुँचा रही है। ‘आप’ के दफ्तर में अब झाड़ू तो है, लेकिन उसे पकड़ने वाले हाथ धीरे-धीरे ‘कमल’ थाम रहे हैं। झाड़ू लेकर खड़े केजरीवाल जी शायद यह भूल गए कि घर की सफाई में कहीं पूरा घर ही खाली न हो जाए!

