भवानीमण्डी | ( जगदीश पोरवाल )24 अप्रैल, 2026
नगर की आस्था के केंद्र और प्राचीन शिवालय मंदिर के पक्ष में उप खण्ड न्यायालय भवानीमण्डी ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। पिछले पाँच दशकों से राजस्व रिकॉर्ड की एक त्रुटि के कारण जो भूमि पूर्व पुजारी परिवार के नाम दर्ज थी, उसे अब पुनः ‘देवता’ के नाम दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि: सेटलमेंट की त्रुटि और 50 वर्ष का संघर्ष
विवाद की जड़ 50 वर्ष पूर्व हुए भूमि सेटलमेंट में थी, जहाँ विधिक नियमों की अनदेखी कर मंदिर की भूमि को व्यक्तिगत नाम पर दर्ज कर दिया गया था। यह राजस्थान काश्तकारी अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन था। अप्रैल 2024 में मंदिर संचालन ट्रस्ट द्वारा न्यायालय की शरण लेने के बाद, वर्तमान उप खण्ड अधिकारी सुश्री श्रद्धा गोमे ने मामले में तत्परता दिखाते हुए तहसील पचपहाड़ से विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की।
जांच में खुले महत्वपूर्ण तथ्य
तहसील के ‘मंदिर माफी रजिस्टर’ और राजस्व अभिलेखों के सूक्ष्म अवलोकन से न्यायालय के समक्ष कई चौंकाने वाले तथ्य आए:
- गैर-मुमकिन मंदिर: राजस्व रिकॉर्ड में भूमि की किस्म ‘गैर-मुमकिन मंदिर’ के रूप में दर्ज थी, जो सिद्ध करता है कि यह भूमि सदैव सार्वजनिक धार्मिक कार्यों हेतु आरक्षित थी।
- विधिक स्वामित्व: रिकॉर्ड्स के अनुसार मूल रूप से यह भूमि ‘माफी बगीची मंदिर शिवजी’ के नाम ही थी और प्रतिवादीगण का इस पर कभी भी काश्त या विधिक अधिकार नहीं रहा।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी: देवता हैं ‘शाश्वत नाबालिग’
न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के नजीरों का हवाला देते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत को दोहराया। फैसले में कहा गया कि:
”कानून की दृष्टि में ‘देवता’ (Deity) एक शाश्वत नाबालिग (Perpetual Minor) होते हैं। जिस प्रकार राज्य का कर्तव्य नाबालिगों और दिव्यांगों के हितों की रक्षा करना है, उसी प्रकार मंदिर की संपत्ति का संरक्षण करना न्यायालय और प्रशासन का विधिक दायित्व है।”

भविष्य के लिए सुरक्षा घेरा
22 अप्रैल 2026 को जारी इस आदेश में न केवल भूमि मंदिर के नाम दर्ज करने को कहा गया है, बल्कि भविष्य के लिए भी इसे सुरक्षित कर दिया गया है। आदेशानुसार, अब इस भूमि को किसी भी ट्रस्ट, संस्था या व्यक्ति द्वारा न तो बेचा जा सकेगा और न ही हस्तांतरित किया जा सकेगा।
जनता में हर्ष की लहर:
शिवालय मंदिर भवानीमण्डी और ग्रामीण क्षेत्रों की अगाध श्रद्धा का केंद्र है। इस निर्णय से मंदिर की संपत्ति के खुर्द-बुर्द होने का खतरा सदैव के लिए समाप्त हो गया है, जिसका स्थानीय श्रद्धालुओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने स्वागत किया है।

