राजस्थान कांग्रेस में ‘मुस्कुराहटों’ का सियासी गणित: गहलोत-पायलट की मुलाकात के मायने


जगदीश पोरवाल

​राजस्थान की राजनीति में जब भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट एक फ्रेम में नजर आते हैं, तो वह महज एक तस्वीर नहीं, बल्कि एक बड़ी सियासी सुगबुगाहट बन जाती है। हाल ही में दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय, इंदिरा भवन में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जिसने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।


​”फोटो ले लो… फिर कहोगे बनती नहीं है”


​ओबीसी एडवाइजरी काउंसिल की बैठक में शामिल होने पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जैसे ही अपनी कार से उतरे, सचिन पायलट उनसे मिलने पहुंचे। दोनों नेताओं ने न केवल गर्मजोशी से हाथ मिलाया, बल्कि कैमरों के सामने सहज अंदाज में बातचीत भी की।


​इस दौरान अशोक गहलोत का चुटीला अंदाज चर्चा में रहा। उन्होंने वहां मौजूद पत्रकारों से मुस्कुराते हुए कहा, “फोटो ले लो… फिर कहोगे बनती नहीं है।” गहलोत का यह तंज उन अटकलों पर था जो लंबे समय से दोनों नेताओं के बीच ‘शीतयुद्ध’ को लेकर लगाई जाती रही हैं।


​खट्टे-मीठे रिश्तों का लंबा सफर


​राजस्थान कांग्रेस का यह अध्याय सहयोग और संघर्ष की एक ऐसी कहानी है, जहां दूरियां और नजदीकियां साथ-साथ चलती हैं।



  • कड़वाहट का दौर: एक समय वह भी था जब गहलोत ने पायलट के लिए “निकम्मा” और “नाकारा” जैसे बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था। मानेसर प्रकरण की टीस आज भी समय-समय पर बयानों में झलकती रही है।

  • अनुशासन की चुनौती: 22 सितंबर 2022 की वह घटना आज भी ताजा है, जब मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन जैसे पर्यवेक्षकों की मौजूदगी के बावजूद गहलोत गुट के विधायकों ने समानांतर बैठक कर आलाकमान को चुनौती दी थी।


​कार्टूनिस्ट का नजरिया: जो दिखता है, वह होता नहीं…


​प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने ताजा कार्टून के जरिए इस मुलाकात की गहराई पर कटाक्ष किया है। कार्टून में एक पात्र हाथ में अखबार की कटिंग लिए कह रहा है— “राजनीति में जो होता है वो दिखता नहीं, जो दिखता है वह होता नहीं…”। यह पंक्ति सीधे तौर पर उस ‘पॉलिटिकल कैमौफ्लेज’ (राजनीतिक छलावे) की ओर इशारा करती है, जहां कैमरे के सामने की मुस्कुराहटें अंदरूनी मतभेदों को ढंकने की कोशिश मात्र लगती हैं।


मजबूरी का संतुलन ?

​भले ही सार्वजनिक मंचों पर हाथ मिलाना और हंसी-मजाक करना एकजुटता का संदेश देने की कोशिश हो, लेकिन राजस्थान की सियासत के जानकार इसे ‘मजबूरी का संतुलन’ ज्यादा मानते हैं। क्या यह केवल एक फोटो अवसर था या दिल की दूरियां भी कम हो रही हैं? यह आने वाला वक्त तय करेगा, फिलहाल तो दिल्ली की इस मुलाकात ने कार्यकर्ताओं को एक नई ‘उम्मीद’ और विरोधियों को नया ‘मसाला’ दे दिया है।


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