खाड़ी में ‘रेलवे फाटक’: जब परमाणु की जंग समंदर के ‘टैक्स बैरियर’ होर्मुज पर आकर रुकी



जगदीश पोरवाल

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर कभी-कभी ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जो बड़े-बड़े मिसाइलों से ज़्यादा असरदार होती हैं। अमेरिका और इज़राइल पिछले 53 दिनों से ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए ज़ोर-आज़माइश कर रहे थे, लेकिन ईरान ने युद्ध की दिशा ही बदल दी। अब लड़ाई ‘यूरेनियम’ की नहीं, बल्कि ‘होर्मुज के फाटक’ की हो गई है।

समंदर के बीच ‘रेलवे फाटक’ और ईरान का ‘गार्ड’ अवतार

एआई द्वारा तैयार इस कार्टून में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को किसी मोहल्ले के रेलवे फाटक जैसा बना दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता एक हाथ में लीवर थामे आराम से बेंच पर बैठे हैं, जैसे किसी रेलवे क्रॉसिंग के गेटमैन हों। संदेश साफ़ है—“ट्रेन (जहाज) तभी गुज़रेगी, जब गार्ड साहब का मूड होगा।” अब यह कोई खुला जलमार्ग नहीं, बल्कि ईरान की ‘इच्छा’ का गलियारा बन गया है। ईरान तय कर रहा है कि किस मालवाहक जहाज को रास्ता देना है और किसे बीच लहरों में खड़ा रखना है।

ट्रम्प और नेतन्याहू: भारी बैट, खाली हाथ

तस्वीर में अमेरिकी दिग्गज डोनाल्ड ट्रम्प ‘प्रेशर’ का बल्ला लेकर चिल्ला रहे हैं, और नेतन्याहू अपनी ‘मांगों’ का बैट ताने खड़े हैं। लेकिन विडंबना देखिए, परमाणु बम फोड़ने की धमकी देने वाले ये दिग्गज अब एक लकड़ी के फाटक के सामने बेबस नज़र आ रहे हैं। वे चिल्ला रहे हैं कि “होर्मुज खोलना ही होगा”, लेकिन ईरान का लीवर टस से मस नहीं हो रहा।

भारत और यूरोप की रसोई पर ‘रेड सिग्नल’

ईरान के इस ‘ट्रम्प कार्ड’ ने भारत और यूरोपीय देशों की रातों की नींद उड़ा दी है।
क्रूड ऑयल: भारत आने वाले तेल के टैंकर फाटक के दूसरी ओर कतार में खड़े हैं।
LPG संकट: यूरोप जाने वाली गैस की सप्लाई अब ईरान की ‘परमिट’ पर टिकी है।
युद्ध विराम (सीजफायर) तो हो गया, लेकिन ईरान ने युद्ध को बम-बारूद के मैदान से हटाकर आर्थिक नाकाबंदी के फाटक पर ला खड़ा किया है।

असली कब्ज़ा किसका?

अमेरिका अब किसी भी कीमत पर इस ‘फाटक’ की चाबी अपने पास रखना चाहता है, जबकि ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता का ‘गेट’ बना लिया है। परमाणु वाली बड़ी-बड़ी बातें अब इस बात पर आकर सिमट गई हैं कि “आज गेट खुलेगा या नहीं?” दुनिया देख रही है कि कैसे एक छोटा सा ‘लीवर’ और ‘फाटक’ सुपरपावर्स की रणनीतियों पर भारी पड़ रहा है। अब देखना यह है कि क्या अमेरिका इस फाटक को तोड़ पाएगा या उसे ईरान की ‘इच्छा’ के आगे कतार में लगना पड़ेगा।

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