भवानीमंडी (जगदीश पोरवाल )
देश में बढ़ती गर्मी ने केवल पारा ही नहीं चढ़ाया है, बल्कि नींबू के तेवरों को भी सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। जो नींबू कल तक दुकानों और घरों के बाहर लटककर ‘बुरी नजर’ से सुरक्षा का ठेका लिए बैठा था, आज वह खुद अपनी बढ़ती कीमतों की ‘नजर’ का शिकार हो गया है। खुदरा बाजार में नींबू के भाव 200 से 300 रुपये प्रति किलो क्या हुए, अंधविश्वास के बाजार में भी भारी मंदी देखने को मिल रही है।
टूट गया सात मिर्ची और एक नींबू का सात जन्मों का साथ
वर्षों से चली आ रही परंपरा थी—सात हरी मिर्च और उनके बीच में एक रसीला नींबू। शनिवार आते ही दुकानदार पूरी श्रद्धा के साथ इसे अपने शटर पर टांगते थे। लेकिन वर्तमान हालात ने इस ‘सुरक्षा कवच’ में दरार डाल दी है।
कार्टूनिस्ट अशोक जी के व्यंग्य में साफ दिख रहा है कि दुकानदार अब केवल सात मिर्चियों से ही काम चला रहे हैं। पूछने पर जवाब मिलता है— “भैया, जो नींबू दूसरों को नजर से बचाता था, आज उसे खुद महंगाई की ऐसी नजर लगी है कि वह हमारी पहुंच से बाहर हो गया है।”
अब मिर्ची ही संभालेगी मोर्चा!
ग्राहकों का कहना है कि अब बुरी नजर वाले का भी क्या कसूर? वह भी नींबू के रेट सुनकर वापस लौट जा रहा है। लोगों में चर्चा है कि अब नींबू लटकाना अमीरी का प्रतीक बन चुका है। मध्यमवर्गीय दुकानदार अब टोटके में भी ‘कॉस्ट कटिंग’ (Cost Cutting) करने को मजबूर है। विशेषज्ञों (पड़ोस के दुकानदारों) का मजाकिया लहजे में कहना है कि अगर भाव ऐसे ही बढ़ते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब नींबू की जगह उसकी ‘फोटो’ या ‘नींबू फ्लेवर वाली कैंडी’ से ही नजर उतारी जाएगी।
नींबू हुआ ‘नॉट रिचेबल’
अखबार की रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण भारत में कम बारिश और बढ़ते तापमान ने नींबू की आवक आधी कर दी है। जहां मंडियों में 15 गाड़ियां आती थीं, वहां अब केवल 5-6 ही पहुंच रही हैं। जनता का कहना है कि शिकंजी पीना तो दूर की बात है, अब तो नजर उतारने के लिए भी नींबू का इस्तेमाल करना “लक्जरी” निवेश जैसा लग रहा है।
नींबू अपनी सुरक्षा के लिए जिरह कर रहा है और मिर्चियां अकेले ही मैदान में डटी हुई हैंन
कुल मिलाकर, महंगाई ने एक बात साबित कर दी है कि अंधविश्वास चाहे कितना भी गहरा हो, जेब की खाली जेब उसे भी आधुनिक और ‘किफायती’ बनाने पर मजबूर कर देती है। फिलहाल, नींबू अपनी सुरक्षा के लिए जिरह कर रहा है और मिर्चियां अकेले ही मैदान में डटी हुई हैं!

