‘नारी वंदन’ का पोस्टर और सड़क का रियलिटी शो: व्यंग्य की सीधी चोट
भवानीमंडी (जगदीश पोरवाल)।
देश में इन दिनों ‘नारी वंदन’ का मौसम पूरे शबाब पर है। मंच सजे हैं, भाषण दमदार हैं, और पोस्टरों में नारी सम्मान ऐसे चमक रहा है जैसे बस अब धरती पर ‘सतयुग’ उतरने ही वाला हो।
लेकिन कार्टूनिस्ट अशोक श्री श्रीमाल की कलम ने इस ‘सतयुग’ के पोस्टर पर हकीकत की स्याही कुछ इस अंदाज में उड़ेली है कि पूरा दृश्य ही बदल जाता है।
पोस्टर में वंदन, सड़कों पर ‘वंदन-भंग’
कार्टून में एक सहमी हुई महिला खड़ी है, जिसके चारों तरफ उड़ती खबरें बता रही हैं—
कहीं छेड़छाड़, कहीं अभद्रता, कहीं उत्पीड़न।
और ऊपर से आवाज आ रही है— “ दरिंदों में डर, महिलाओं में भरोसा… यही है असली नारी वंदन!”
अब सवाल ये है कि ये भरोसा आखिर मिलता कहां है?
पोस्टर में… या फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस के भाषणों में?
सरकारी दावा vs जमीनी ड्रामा
सरकार कहती है— “नारी शक्ति को सम्मान मिल रहा है।”
सड़क कहती है— “पहले सुरक्षा तो दिलाओ साहब!”
ऐसा लगता है मानो ‘नारी वंदन’ एक ऐसा ऐप है जो केवल लॉन्च हो चुका है, लेकिन अभी तक डाउनलोड किसी के मोबाइल में नहीं हुआ।
कानून का डर या ‘सेटिंग’ का असर?
कार्टून का असली तीर यहीं लगता है—
जब तक अपराधी को कानून से ज्यादा ‘जुगाड़’ पर भरोसा रहेगा, तब तक ‘वंदन’ सिर्फ विज्ञापन रहेगा और ‘क्रंदन’ हकीकत।
समाज भी कटघरे में
व्यंग्य सिर्फ सरकार पर नहीं, हम सब पर है।
हम बच्चों को पढ़ाते हैं— “बेटी बचाओ”,
लेकिन ये नहीं सिखाते— “बेटियों का सम्मान कैसे करो।”
जब तक घर से ही संस्कार की नींव मजबूत नहीं होगी, तब तक सड़क पर कानून भी अकेला पड़ जाएगा।
व्यंग्य का निचोड़
कार्टून साफ कहता है—
“साहब, नारी वंदन पोस्टर से उतारकर सड़क पर भी लागू कर दीजिए।”
वरना हाल ये रहेगा कि
ऊपर ‘वंदन’ गूंजेगा…
और नीचे ‘क्रंदन’ सुनाई देगा।
नारी सम्मान की असली परीक्षा मंचों पर नहीं, सड़कों पर होती है।
जिस दिन दरिंदों के दिल में कानून का डर और समाज का दबाव दोनों आ जाएगा, उसी दिन ‘नारी वंदन’ सच में ‘वंदनीय’ बन जाएगा।

