संघर्ष, साहित्य और सिनेमा: पहचान के बदलते आयाम,सीमा कपूर के अनुभवों की एक झलक



✒️जगदीश पोरवाल “पत्रकार” ( भवानीमंडी )


— सीमा कपूर के अनुभवों की एक झलक,संघर्षों से सफलता तक की एक कहानी



हाल ही में भवानीमंडी प्रवास के दौरान प्रख्यात फिल्म निर्देशिका, लेखिका और अभिनेता अन्नू कपूर की बहन फिल्म अभिनेता ओमपुरी की पत्नी सीमा कपूर ने जीवन, समाज और सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर अपने बेबाक विचार साझा किए। कैलाश चंद जैन (एडवोकेट) के निवास पर आयोजित इस चर्चा में उन्होंने न केवल अपनी आगामी परियोजनाओं पर बात की, बल्कि आधुनिक समाज की विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं को भी गहराई से छुआ।

पहचान: नाम बनाम काम

सीमा कपूर का मानना है कि आज भी समाज में किसी महिला की पहचान उसके पति या भाई के नाम से की जाती है, जो कि विडंबनापूर्ण है। उनका कहना है कि “किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके काम से होनी चाहिए।” उन्होंने इस बात पर खेद प्रकट किया कि एक महिला कितनी भी सफल क्यों न हो जाए या बड़े से बड़ा पुरस्कार प्राप्त कर ले, समाज में उसे अक्सर स्वयं की स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है।

साहित्य, सिनेमा और समाज का दर्पण

चर्चा के दौरान उन्होंने लेखकों की उपेक्षा पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आम आदमी अक्सर अभिनेता को ही सर्वोपरि समझता है, जबकि वास्तविकता में राइटर (लेखक) उससे भी बड़ा होता है, क्योंकि वह पूरी कहानी और पात्रों का सृजन करता है। दुर्भाग्यवश, जनता के बीच लेखक हमेशा गौण ही रह जाता है।
सिनेमा के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा:
कला और वाणिज्य का संतुलन: एक निर्माता फिल्म इस उम्मीद में बनाता है कि वह मुनाफा कमाए, लेकिन एक सफल फिल्म वही है जो समाज पर गहरा प्रभाव छोड़े और साथ ही मनोरंजन भी प्रदान करे।
समय के साथ बदलाव: 70 के दशक के थिएटर और आज के सिनेमा में जमीन-आसमान का अंतर है। जैसे-जैसे समाज बदलता है, फिल्मों का स्वरूप भी बदलता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस तरह कठपुतली कला के कलाकार आज रिक्शा चलाने या मजदूरी करने पर मजबूर हैं, वैसे ही सिनेमा को भी बदलते वक्त के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है।



माता-पिता का संघर्ष और पारिवारिक विरासत

अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देते हुए उन्होंने भावुक होकर कहा कि अन्नू कपूर, रणजीत कपूर और स्वयं उनके पीछे उनकी माँ का बहुत बड़ा संघर्ष रहा है। उन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि अक्सर लोग बच्चों की कामयाबी में माता-पिता के योगदान को भुला देते हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा “यूँ ही गुजारी है अब तलक” का जिक्र करते हुए संदेश दिया कि जीवन संघर्षों से भरा है, लेकिन इंसान को कभी टूटना नहीं चाहिए, क्योंकि हर अंधेरी रात के बाद सवेरा निश्चित है।

आधुनिक चुनौतियाँ: मोबाइल और बचपन

आजकल के बच्चों में मोबाइल की बढ़ती लत पर उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त की। इसकी तुलना ‘ड्रग्स’ से करते हुए उन्होंने माता-पिता को इसका दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि पहले माताएं काम के समय बच्चों को सुलाने के लिए अफीम का सहारा लेती थीं, और आज उसकी जगह मोबाइल ने ले ली है। उनके अनुसार, बचपन हमेशा ‘वर्तमान’ (Present) में जीता है, और तकनीक इस मासूमियत को छीन रही है।

भवानीमंडी से जुड़ाव और आगामी प्रोजेक्ट्स

भवानीमंडी से अपनी यादें साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनका बचपन इसी मिट्टी में अत्यंत अभावों के बीच बीता है। एक समय था जब साइकिल के लिए 10 पैसे भी नहीं होते थे, और आज ईश्वर की कृपा से सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता ईश्वरचंद्र भटनागर जैसे बुजुर्गों के सानिध्य को अपनी सफलता की नींव बताया।

भविष्य की योजनाएं:

उनकी आगामी फिल्म ‘पतंग मसाला’ इस वर्ष अक्टूबर तक शुरू होने की संभावना है।
वर्तमान में वह भवानीमंडी और झालावाड़ की शांत वादियों में एक उपन्यास लिखने के उद्देश्य से आई हैं, ताकि प्रकृति के सानिध्य में अपने लेखन को पूर्ण कर सकें।
यह चर्चा हमें याद दिलाती है कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँचने के बाद भी अपनी जड़ों और अपने संघर्षों को याद रखना ही एक सच्चे कलाकार की पहचान है।

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