- चुनावी भूगोल का गणित: जहाँ चुनाव, वहाँ ‘लक्ष्मी’; जहाँ सत्ता, वहाँ सिर्फ ‘प्रतीक्षा’!
भवानीमंडी । ( जगदीश पोरवाल )भारतीय राजनीति में ‘वादों’ की कोई सीमा नहीं होती, लेकिन भौगोलिक सीमाएं अक्सर एक नई समस्या खड़ी कर देती हैं। ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल के चुनावों के लिए जारी भाजपा के ‘संकल्प पत्र’ का है, जिसमें महिलाओं को हर महीने ₹3000 देने का वादा किया गया है। लेकिन इस वादे की गूंज बंगाल से ज्यादा अब राजस्थान के गलियारों में सुनाई दे रही है।
कार्टून का ‘कड़वा’ सच
कार्टूनिस्ट अशोक ने अपनी कूची से एक ऐसी विडंबना को उकेरा है जो चुनावी वादों के दोहरेपन को उजागर करती है। कार्टून में एक आक्रोशित राजस्थानी महिला, हाथ में अखबार की वह कटिंग लिए खड़ी है जिसमें बंगाल की महिलाओं के लिए ₹3000 का वादा किया गया है। बगल में एक राजनेता (संभवतः राजस्थान के संदर्भ में) ग्लानि और लाचारी के भाव के साथ सिर झुकाए खड़े हैं।
महिला का सवाल सीधा और चुभने वाला है: “हम राजस्थान की महिलाएं सौतेली हैं क्या?”
व्यंग्य के मुख्य बिंदु:
चुनावी भूगोल और प्रेम: राजनीति का दस्तूर है कि ‘प्यार’ वहीं ज्यादा उमड़ता है जहाँ ‘वोट’ की फसल काटनी हो। बंगाल में लक्ष्मी को घर लाने के लिए ₹3000 की पेशकश है, जबकि दूसरे राज्यों की महिलाएं सोच रही हैं कि क्या उनकी अर्थव्यवस्था केवल ‘महंगाई’ झेलने के लिए बनी है?
संकल्प बनाम मलाल: अखबार की खबर में अमित शाह ‘सोनार बांग्ला’ के निर्माण का रोडमैप दिखा रहे हैं, लेकिन कार्टूनिस्ट ने दिखाया है कि यह रोडमैप राजस्थान जैसी जगहों पर ‘भावनाओं के एक्सीडेंट’ का कारण बन रहा है।
बजट का जादुई खेल: यह व्यंग्य इस बात पर भी है कि कैसे राजनीतिक दल एक राज्य में जिसे ‘रेवड़ी’ कहते हैं, दूसरे राज्य में उसे ‘सशक्तीकरण’ का नाम दे देते हैं।
राजस्थान के हिस्से में केवल चुनावी भाषण ही क्यों ? कार्टूनिस्ट का व्यंग्य
अशोक का यह कार्टून केवल एक रेखाचित्र नहीं, बल्कि मतदाताओं की उस बढ़ती जागरूकता का प्रतीक है जो अब राज्यों के बीच तुलना करने लगी है। अगर बंगाल में महिलाओं के लिए खजाना खुल सकता है, तो राजस्थान की ‘वीरांगनाओं’ का यह पूछना जायज है कि उनके हिस्से में केवल चुनावी भाषण ही क्यों आए?
नेताओं के लिए संदेश साफ है: सोशल मीडिया और डिजिटल अखबार के ज़माने में, एक राज्य का ‘मास्टरस्ट्रोक’ दूसरे राज्य के लिए ‘सिरदर्द’ बन सकता है।

