डीएपी का सस्ता और असरदार विकल्प बना एसएसपी: झालावाड़ के किसानों को मिल रहा दोहरा लाभ

झालावाड़। ( जगदीश पोरवाल ) जिले में कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। महंगे और आयातित डीएपी (DAP) के मुकाबले अब किसान स्वदेशी उर्वरक सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, एसएसपी न केवल फसलों की गुणवत्ता सुधार रहा है, बल्कि खेती की लागत घटाकर किसानों की आय में भी बढ़ोतरी कर रहा है।

क्यों है एसएसपी, डीएपी से बेहतर?

​कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. नरेश कुमार शर्मा ने बताया कि डीएपी में मुख्य रूप से नाइट्रोजन और फॉस्फोरस होता है, जबकि एसएसपी एक बहु-पोषक तत्व उर्वरक है। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:

  • पोषक तत्वों का खजाना: एसएसपी में 16% फॉस्फोरस के साथ 11% सल्फर और लगभग 21% कैल्शियम पाया जाता है।
  • मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार: डीएपी के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी का संतुलन बिगड़ता है, जबकि एसएसपी में मौजूद कैल्शियम मिट्टी की संरचना को सुधारता है।
  • सल्फर का जादू: तिलहनी (सरसों) और मसाला फसलों (लहसुन, धनिया) में सल्फर से सुगंध, तीखापन और तेल की मात्रा बढ़ती है।

बचत का गणित: ₹2000 तक का फायदा

​विभाग के अनुसार, यदि किसान 3 बैग एसएसपी और 1 बैग यूरिया के मिश्रण का उपयोग करते हैं, तो उन्हें डीएपी की तुलना में अतिरिक्त नाइट्रोजन, सल्फर, जिंक और कैल्शियम प्राप्त होता है। यदि यही पोषक तत्व अलग-अलग खरीदे जाएं, तो किसानों को प्रति एकड़ ₹2000 से अधिक अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं। एसएसपी के उपयोग से यह लागत सीधे बच जाती है।

झालावाड़ में बढ़ता रुझान

​राजस्थान के उदयपुर और कोटा जैसे जिलों में उत्पादित होने वाले इस उर्वरक का झालावाड़ में सर्वाधिक उपयोग हो रहा है। यहाँ के किसान प्रति वर्ष लगभग 65 से 75 हजार मैट्रिक टन एसएसपी का प्रयोग कर रहे हैं। वर्तमान में बाजार में फोर्टीफाइड एसएसपी भी उपलब्ध है, जिसमें जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म तत्व पहले से मिले होते हैं।

​”एसएसपी न केवल एक किफायती खाद है, बल्कि यह हमारी मिट्टी को बंजर होने से बचाने और उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ाने का एक स्वदेशी समाधान है।”

डॉ. नरेश कुमार शर्मा, संयुक्त निदेशक (कृषि)

जागरूकता अभियान जारी

​कृषि विभाग अब ग्राम पंचायत स्तर पर कृषक गोष्ठियों का आयोजन कर रहा है ताकि अधिक से अधिक किसानों को एसएसपी के सही उपयोग और मृदा सुधार की जानकारी दी जा सके।

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