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भैसोदा | (जगदीश पोरवाल ) नगर परिषद भैसोदा में पुरानी और स्वीकृत कॉलोनियों के विकास कार्यों और उन पर लगने वाले ‘विकास शुल्क’ को लेकर विवाद गहरा गया है। एक ओर जहाँ जनता पर वित्तीय बोझ डालने का विरोध हो रहा है ।
पूर्व सरपंच के गंभीर आरोप: “जनता क्यों भरे कॉलोनाइजर की लापरवाही का हर्जाना?”
भैसोदा के पूर्व सरपंच और वरिष्ठ भाजपा नेता श्याम गुर्जर ने इस मुद्दे पर अपनी ही पार्टी की परिषद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। गुर्जर का आरोप है कि कॉलोनाइजरों और प्रशासन की मिलीभगत के कारण उन जमीनों और भूखंडों को बेचा जा रहा है, जिन्हें सार्वजनिक उपयोग (पार्क या अन्य सुविधाएं) के लिए सुरक्षित रखा जाना था।उन्होंने
मध्यप्रदेश कॉलोनी विकास नियम 2021 की धारा 23(3) और 23(4) का हवाला देते हुए कहा:
“नियमों के अनुसार, यदि कॉलोनी में विकास कार्य अधूरे हैं, तो कॉलोनाइजर की बची हुई भूमि और भूखंडों को राजसात (Seize) कर विकास की राशि उनसे वसूली जानी चाहिए। प्रशासन आम जनता से विकास शुल्क वसूल कर नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रहा है, जो सरासर अन्याय है।”
श्याम गुर्जर ने इस संबंध में जिला कलेक्टर और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को शिकायत भेजकर नियमों के पालन की मांग की है।
नगर परिषद अध्यक्ष का पक्ष: “हमने की है FIR, पुराने नियमों का हवाला”
विवादों के बीच नगर परिषद अध्यक्ष गायत्री पौराणिक ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने बताया कि पदभार संभालते ही उन्होंने कॉलोनाइजरों की अनियमितताओं के खिलाफ कदम उठाए थे।
- पुलिस कार्रवाई: अध्यक्ष के अनुसार, लगभग 3 वर्ष पूर्व ही कॉलोनाइजर के खिलाफ भैसोदामंडी पुलिस चौकी में FIR दर्ज कराई गई थी, ताकि सार्वजनिक पार्क जैसी भूमि को नगर परिषद के नाम हस्तांतरित किया जा सके।
- लाल पिच विवाद पर स्पष्टीकरण: ‘लाल पिच’ क्षेत्र में विकसित हो रही कॉलोनी पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि वह भूमि ‘स्लम एरिया’ के लिए छोड़ी गई थी। नियम यह है कि पंचायत को 3 वर्ष के भीतर उस पर कब्जा लेना होता है। चूंकि तत्कालीन पंचायत ने समय सीमा में कोई कदम नहीं उठाया, इसलिए कानूनन कॉलोनाइजर उस भूमि को बेचने के लिए स्वतंत्र हो गया।
क्या है जनता की मांग?
पूर्व सरपंच श्याम गुर्जर का कहना है कि 25-30 साल पुरानी कॉलोनियों, जो T&CP नीमच से स्वीकृत हैं, वहां अब विकास शुल्क वसूलना तर्कसंगत नहीं है। जनता का स्पष्ट मत है कि प्रशासन को कड़ा रुख अपनाते हुए कॉलोनाइजरों की संपत्ति कुर्क करनी चाहिए और उससे प्राप्त राशि से विकास कार्य करवाने चाहिए।
निष्कर्ष
फिलहाल, यह मामला सियासी और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक तरफ नियमों की व्याख्या है तो दूसरी तरफ जनता का आक्रोश। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में हस्तक्षेप कर आम नागरिकों को राहत दिलाता है या विवाद और बढ़ता है।
नोट- चित्र एआई द्वारा निर्मित काल्पनिक है ।

