यह कार्टून राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों को लेकर चल रही खींचतान और प्रशासनिक सुस्ती पर तीखा कटाक्ष करता है। कार्टूनिस्ट अशोक ने जिस तरह से ‘चुनाव आयोग’ और ‘सचिवालय’ के बीच फंसे आम आदमी या नेता की व्याकुलता दिखाई है, वह वर्तमान राजनीतिक अनिश्चितता को बखूबी बयां करती है।
भवानीमंडी ( जगदीश पोरवाल )। एक तरफ देश के पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बज चुका है, नेताजी अपनी रैलियों में पसीना बहाने को तैयार बैठे हैं, और जनता नेताओं के वादे सुनने को आतुर है । लेकिन राजस्थान की राजनीति का हाल ‘थ्री इडियट्स’ के उस दृश्य जैसा है, जहाँ सब कुछ तैयार है पर ‘डिलीवरी’ का पता नहीं! यहाँ पंचायत और निकाय चुनावों की तारीखों का इंतज़ार किसी पुराने हिंदी सीरियल की अगली कड़ी जैसा लंबा होता जा रहा है।
न्यायपालिका का आदेश, कार्यपालिका की ‘खामोशी’
कार्टूनिस्ट अशोक के कूचे से निकले इस चित्र ने राजस्थान की प्रशासनिक मशीनरी की नींद उड़ा दी है। न्यायालय का स्पष्ट आदेश है कि 15 अप्रैल तक चुनाव करा लिए जाएं। लेकिन सचिवालय और चुनाव आयोग के बीच की दूरी मानों कोसों दूर की हो गई है। कार्टून में एक व्याकुल व्यक्ति (संभवतः कोई भावी पार्षद या सरपंच प्रत्याशी) पसीने-पसीने होकर पूछ रहा है— “मी लॉर्ड, तीस दिन बचे हैं, सब तरफ सन्नाटा है… कहीं आदेश ठंडे बस्ते में तो नहीं चला गया?”
खींचतान के तीन कोण
फिलहाल प्रदेश में लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों के बीच दिलचस्प ‘म्यूजिकल चेयर’ चल रही है:
न्यायपालिका: “समय सीमा तय है, काम शुरू करो!”
कार्यपालिका (प्रशासन): “हम फाइल ढूंढ रहे हैं, शायद किसी चाय के कप के नीचे दबी हो।”
विधायिका (सरकार): “तैयारी पूरी है, बस शुभ मुहूर्त का इंतज़ार है।”
सन्नाटा ही शोर है
आम तौर पर चुनाव के नाम पर गलियों में शोर मचता है, लेकिन यहाँ सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा इस बात का प्रतीक है कि शायद विभाग अभी भी यह तय नहीं कर पाए हैं कि पहले रास्ता ‘चुनाव आयोग’ की तरफ जाता है या ‘सचिवालय’ की तरफ। जनता कन्फ्यूज है कि वह वोट डालने के लिए पहचान पत्र अपडेट कराए या फिर से ‘न्यायपालिका’ की शरण में जाए।
पंचायत और नगर निकाय चुनाव को लेकरअलग ही चर्चाएं
राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनाव को लेकर नेताओं के साथ-साथ जनता की चौपालों पर भी चर्चाओं का बाजार काफी गर्म है,सभी अपने-अपने हिसाब से आंकलन कर रहे हैं ,कोई कह रहा है मई जून में चुनाव होंगे कोई कह है नवंबर में होंगे उधर बेचारी जनता अभी प्रशासन के भरोसे है क्योंकि सारा कार्यभार प्रशासन देख रहा है ।
निष्कर्ष: अशोक का यह कार्टून केवल एक रेखाचित्र नहीं, बल्कि राजस्थान की मौजूदा चुनावी सुस्ती का ‘पोस्टमार्टम’ है। अब देखना यह है कि प्रशासन ’15 अप्रैल’ की डेडलाइन को गंभीरता से लेता है या फिर जनता को एक बार फिर यही सुनने को मिलेगा— “पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!”


