वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल और भारत की एकजुटता का प्रश्न

अग्निपरीक्षा के दौर में राष्ट्र की सामूहिक चेतना

वैश्विक संकट की विभीषिका

आज संपूर्ण विश्व एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के त्रिकोणीय संघर्ष ने मध्य-पूर्व की स्थिरता को भंग कर दिया है, जिसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस बाजार पर पड़ा है। यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है; मलेशिया से लेकर पाकिस्तान तक और जापान से लेकर चीन तक, दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं इस अवांछित युद्ध की तपिश महसूस कर रही हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या इस वैश्विक आपदा के लिए किसी राष्ट्र के आंतरिक नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराना तर्कसंगत है?

राजनीतिक शुचिता और विपक्ष का दायित्व

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका प्रहरी की होती है, लेकिन संकट के समय वह ‘सहभागी’ की भी होनी चाहिए। रसोई गैस की कीमतों और उपलब्धता को लेकर राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों द्वारा सरकार पर किया जा रहा प्रहार संकीर्ण राजनीतिक लाभ की ओर इशारा करता है। यह युद्ध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू नहीं किया, न ही यह उनकी नीतियों का परिणाम है। फिर भी, इस अंतरराष्ट्रीय विवशता को ‘मोदी विरोधी’ हथियार बनाना और जनता के बीच ‘पैनिक’ पैदा करना न केवल अनुचित है, बल्कि राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने जैसा है।

तुलनात्मक विश्लेषण: उपलब्धियां बनाम आकस्मिक बाधाएं

हमें पिछले एक दशक के ट्रैक रिकॉर्ड को विस्मृत नहीं करना चाहिए। पिछले 12 वर्षों में, जब वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल थीं, मोदी सरकार ने एलपीजी की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की। ‘उज्ज्वला योजना’ के माध्यम से अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक गैस कनेक्शन पहुँचाना एक क्रांतिकारी कदम था। आज यदि युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) बाधित हुई है, तो यह एक ‘अपरिहार्य संकट’ है न कि ‘प्रशासनिक विफलता’। एक जिम्मेदार विपक्ष को जनता को उकसाने के बजाय संकट प्रबंधन में रचनात्मक सुझाव देने चाहिए।

“संकट के समय में की गई राजनीति, अक्सर राष्ट्र के भविष्य को पीछे धकेल देती है।”

निष्कर्ष: इतिहास की अदालत और हमारी भूमिका

कूटनीति और विदेश नीति की अपनी सीमाएं और चुनौतियां हो सकती हैं, और लोकतंत्र में उनकी समीक्षा होनी ही चाहिए। लेकिन जब देश एक बाहरी संकट से जूझ रहा हो, तब घर के भीतर ही आग लगाना आत्मघाती है। संकट का यह दौर भी बीत जाएगा, लेकिन आने वाली पीढ़ियां और इतिहास यह जरूर दर्ज करेगा कि जब देश को एक स्वर में खड़े होने की आवश्यकता थी, तब कौन राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र के साथ खड़ा था और कौन अपने स्वार्थों के लिए अफवाहों का बाजार गर्म कर रहा था।

​यह समय दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ‘राष्ट्र प्रथम’ (Nation First) की भावना को आत्मसात करने का है।

लेखक: कैलाश जैन एडवोकेट (भवानीमंडी)

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