रेड से ब्लैक तक: गैस सिलेंडरों की राजनीति पर तीखा व्यंग्य


हमारा नेचरल रंग तो रेड है, फिर हमें ब्लैक क्यों कर दिया ?

भवानीमंडी। ( जगदीश पोरवाल ) देश में रसोई गैस को लेकर बढ़ती बहस, कीमतों और उपलब्धता की चर्चाओं के बीच प्रख्यात कार्टूनिस्ट अशोक श्री श्रीमाल का एक व्यंग्यात्मक कार्टून इन दिनों लोगों का ध्यान खींच रहा है। इस कार्टून में दो गैस सिलेंडर आपस में बातचीत करते दिखाई देते हैं और उनके संवाद वर्तमान राजनीतिक माहौल पर तीखा कटाक्ष करते हैं।
कार्टून में एक सिलेंडर दूसरे से नाराजगी जताते हुए कहता है – “हमारा नेचरल रंग तो रेड है, फिर हमें ब्लैक क्यों कर दिया?” इस पर दूसरा सिलेंडर जवाब देता है – “क्योंकि अब हम ब्लैक में बिकते हैं!”

छोटा सा संवाद बड़ी सच्चाई की ओर इशारा-

यह छोटा-सा संवाद दरअसल बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करता है। रसोई गैस की कमी, कीमतों में उतार-चढ़ाव और वितरण व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच आम जनता की परेशानी को कार्टून बेहद सरल लेकिन तीखे अंदाज में सामने लाता है।

गैस सिलेंडर बना विपक्ष के विरोध प्रदर्शन का हथियार-

राजनीतिक गलियारों में गैस सिलेंडर इन दिनों केवल रसोई तक सीमित नहीं रहे, बल्कि विरोध-प्रदर्शनों और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का प्रतीक बन गए हैं। एक ओर विपक्ष सरकार पर गैस की कीमतें बढ़ाने और आपूर्ति व्यवस्था बिगाड़ने का आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए पर्याप्त स्टॉक होने की बात कह रही है।

कार्टूनिस्ट की व्याख्या-कम शब्दों में बड़ी बात

इसी खींचतान के बीच कार्टूनिस्ट अशोक श्री श्रीमाल का यह व्यंग्य बताता है कि असली परेशानी किसकी है। सिलेंडर का “रेड” से “ब्लैक” होना दरअसल उस स्थिति का प्रतीक है, जब आवश्यक वस्तुएं बाजार में कम और चर्चाओं में ज्यादा दिखाई देने लगती हैं।
व्यंग्य की खासियत यही है कि वह कम शब्दों में बड़ी बात कह देता है। इस कार्टून ने भी यही किया है—रसोई गैस की राजनीति और बाजार की हकीकत दोनों को एक ही फ्रेम में दिखा दिया।

व्यंग्य की पंक्ति:
“जब रसोई की आग ठंडी पड़ने लगे, तब राजनीति की गर्मी बढ़ना स्वाभाविक है।”

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