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6 घंटे का सत्र, 47 मिनट चर्चा… बाकी समय नारे, शोर और राजनीतिक अभिनय
विशेष व्यंग्य / टिप्पणी ( जगदीश पोरवाल )
देश की जनता जब मतदान करती है तो उसके मन में कई उम्मीदें होती हैं। वह सोचती है कि उसके द्वारा चुने गए सांसद संसद में बैठकर देश के विकास, जनता की समस्याओं और भविष्य की योजनाओं पर गंभीर चर्चा करेंगे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से संसद का दृश्य कुछ और ही कहानी सुना रहा है।
जैसे ही लोकसभा का सत्र शुरू होता है, लोकतंत्र का मंदिर अचानक राजनीतिक अखाड़े में बदल जाता है। यहां मुद्दों पर कम और माइक, नारे और पोस्टरों पर ज्यादा जोर दिखाई देता है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाने में व्यस्त रहता है और विपक्ष विरोध का ऐसा स्वर उठाता है कि चर्चा का मौका ही खत्म हो जाता है।
हाल ही में बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन का आंकड़ा खुद ही बहुत कुछ कह देता है। कुल 6 घंटे की कार्यवाही निर्धारित थी, लेकिन बहस केवल 47 मिनट ही हो पाई। बाकी 5 घंटे 13 मिनट शोर-शराबे और हंगामे में निकल गए। इस दौरान देश की जनता के टैक्स से चलने वाली संसद की कार्यवाही पर लगभग 7.82 करोड़ रुपये खर्च हो गए — और परिणाम शून्य।
विडंबना देखिए, यही जनप्रतिनिधि मंचों पर खड़े होकर जनता को अनुशासन, जिम्मेदारी और लोकतंत्र की मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन संसद में पहुंचते ही वही मर्यादा सबसे पहले कुर्सी के नीचे रख दी जाती है।
लोकसभा में संख्या का गणित भी दिलचस्प है। सत्ता पक्ष अपने बहुमत के दम पर मजबूत होने का दावा करता है और विपक्ष लोकतंत्र बचाने का। लेकिन जब देश के असली मुद्दों — महंगाई, रोजगार, शिक्षा, किसानों और युवाओं की बात करने का समय आता है, तो दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च करते नजर आते हैं।
देश का आम करदाता सुबह से शाम तक मेहनत करता है, टैक्स देता है और उम्मीद करता है कि उसकी कमाई देश के विकास में लगेगी। लेकिन जब संसद का समय हंगामे में बर्बाद होता है तो यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का असली नुकसान कौन कर रहा है।
अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में संसद की कार्यवाही का नया फार्मूला भी तय हो सकता है —
पहले दो घंटे नारेबाजी, अगले दो घंटे आरोप-प्रत्यारोप और अगर समय बच जाए तो थोड़ी बहुत चर्चा।
लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन समाधान उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर संसद में बैठे जनप्रतिनिधि ही समाधान से दूर भागेंगे, तो फिर जनता के मन में यह सवाल बार-बार उठेगा —
“सांसद संसद में बहस करने जाते हैं या सिर्फ हंगामा करने?”
व्यंग्य
जनता ने सांसद चुने थे देश चलाने के लिए…
लेकिन संसद देखकर लगता है मानो देश की सबसे महंगी “शोर प्रतियोगिता” चल रही हो।
