बस के दरवाज़े पर अटका सफर: निजी बस संचालकों की मनमानी का एक तजुर्बा


भवानीमंडी। ( कैलाश जैन एडवोकेट )
जीवन वास्तव में एक बहुरंगी मंच है। हर दिन हमें कोई नया अनुभव दे जाता है। कुछ अनुभव सुखद होते हैं, कुछ पीड़ादायक, तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें किसी एक नाम में बांधना कठिन होता है। हाल ही में ऐसा ही एक अनुभव हुआ, जिसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कभी-कभी छोटी-सी व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता भी इंसान को कितना संकीर्ण बना देती है।
नीमच से लौटने की थी सरल योजना
7 मार्च की शाम निजी कार्य से नीमच गया हुआ था। उसी दिन शाम को भवानीमंडी लौटने का कार्यक्रम था। जानकारी के अनुसार शाम 4:40 बजे नीमच से एक प्राइवेट बस सीधे भवानीमंडी के लिए निकलती है,
इसी भरोसे के साथ शाम करीब सवा चार बजे नीमच बस स्टैंड पहुंच गया। लेकिन वहां पता चला कि 4:40 वाली बस किसी राजनीतिक दल की रैली में गई हुई है, इसलिए उस दिन उसकी सेवा स्थगित कर दी गई है।

इंतजार से बचने के लिए लिया दूसरा रास्ता

अब सीधे भवानीमंडी जाने के लिए दूसरी बस की तलाश शुरू की। पूछताछ करने पर जानकारी मिली कि शाम छह बजे एक बस भवानीमंडी जाएगी। बस स्टैंड पर खड़ी उसी बस के पास जाकर वहां मौजूद दो व्यक्तियों से पुष्टि की तो उन्होंने बताया कि बस छह बजे ही चलेगी और इसके अलावा कोई दूसरी बस उपलब्ध नहीं है। भानपुरा पहुंचकर वहां से भवानीमंडी के लिए कोई न कोई साधन मिल ही जाएगा और उसी बस में बैठ गया।

रात करीब सवा नौ बजे बस ने भानपुरा बस स्टैंड पर उतार दिया। वहां पूछने पर पता चला कि उस समय भवानीमंडी के लिए कोई बस उपलब्ध नहीं है। कुछ देर तक परिचितों से संपर्क करने और ऑटो वालों से बात करने की कोशिश की।
तभी किसी ने बताया कि करीब पौने दस बजे एक सैयद बस आएगी, जो भवानीमंडी होते हुए सुनेल जाएगी। इसी बीच भवानीमंडी जाने वाले दो-तीन और यात्री मिल गए और हम सब उस बस का इंतजार करने लगे।

बस के दरवाजे पर अजीब स्थिति

ठीक पौने दस बजे बस आ गई। बस रुकी, लेकिन इंजन चालू था। जैसे ही मैं बस में चढ़ने लगा, दरवाजे पर खड़े दो व्यक्तियों ने मुझे रोक दिया और कहा—
“आप मत चढ़ो, यह बस नहीं जाएगी।”
यह सुनकर आश्चर्य हुआ, क्योंकि मेरे साथ के यात्री बस में चढ़ चुके थे। मैंने कहा कि मुझे भवानीमंडी जाना है, लेकिन उनमें से एक व्यक्ति बोला—

यह बस आपके लिए नहीं है।”

ध्यान से देखा तो वे वही दोनों व्यक्ति थे, जिनसे मैंने नीमच में छह बजे वाली बस के बारे में पूछा था। तभी पूरी बात समझ में आ गई—वे इस बात से नाराज थे कि मैंने उनकी बस का इंतजार करने के बजाय दूसरी बस से भानपुरा तक यात्रा कर ली थी।

पहचान के बाद बदला रवैया

कुछ देर तक बहस चलती रही। इसी दौरान बस में बैठे एक यात्री ने मुझे पहचान लिया और कंडक्टर से कहा—
“अरे, ये तो वकील साहब हैं, इन्हें बैठने दीजिए।”
इसके बाद दोनों व्यक्तियों के तेवर कुछ नरम पड़े और मुझे बस में चढ़ने दिया गया। हालांकि बस में बैठने के बाद भी वे यह कहते रहे कि “ज्यादा होशियारी से काम नहीं चलता।”
सेवा या केवल व्यवसाय?

कानून सेवा प्रदाता बिना कारण सेवा देने से मना नही कर सकता

मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि सार्वजनिक परिवहन में किसी यात्री को बिना उचित कारण यात्रा से रोकना नियमों के विरुद्ध है। बस संचालन केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि एक सेवा भी है। सेवा प्रदाता के रूप में किसी व्यक्ति को यूं ही सेवा देने से मना करना उचित नहीं है।
लेकिन ऐसा लगा कि मेरी बात का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
एक सवाल जो मन में रह गया
आखिरकार बस मुझे रात करीब पौने ग्यारह बजे भवानीमंडी उतार गई। सफर तो पूरा हो गया, लेकिन मन में एक सवाल छोड़ गया ।



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