दो-दो दिन के त्योहारों पर कार्टूनिस्ट का तंज: “आखिर असली त्योहार कौन-सा दिन?”

भवानीमंडी। ( जगदीश पोरवाल ) देश में पारंपरिक त्योहारों को एक की बजाय दो-दो दिन मनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कार्टूनिस्ट अशोक श्री श्री माल ने अपने ताजा व्यंग्यात्मक कार्टून के माध्यम से तीखा कटाक्ष किया है। कार्टून में हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाया गया है कि अलग-अलग पंचांगों और मतों के कारण कई बार त्योहार लगातार दो दिन मनाए जाने लगे हैं, जिससे आमजन असमंजस में पड़ जाता है कि असली त्योहार आखिर किस दिन मनाया जाए।

2 दिन त्योहार से परंपरागत एकरूपता प्रभावित होती है-

कार्टून में यह संदेश उभरकर सामने आता है कि जब एक ही त्योहार को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दिन मनाया जाता है तो उसकी परंपरागत एकरूपता प्रभावित होती है। कोई पहले दिन त्योहार मनाता है तो कोई दूसरे दिन, और कई लोग दोनों ही दिन त्योहार का आनंद लेते नजर आते हैं। इस स्थिति में त्योहार की मूल भावना और उत्सव की एकजुटता कहीं न कहीं कमजोर पड़ती दिखाई देती है।

आमजन भ्रमित होता है-

व्यंग्य के माध्यम से कार्टूनिस्ट ने यह भी संकेत दिया है कि त्योहारों की तिथियों को लेकर हर वर्ष होने वाले मतभेदों और अलग-अलग घोषणाओं के कारण आमजन भ्रमित हो जाता है। सोशल मीडिया और विभिन्न पंचांगों के माध्यम से अलग-अलग तिथियां सामने आने से यह स्थिति और भी उलझन भरी बन जाती है।

विद्वानों और ज्योतिषाचार्यो की एक समिति बनाई जाए-

कार्टून में एक तरह से यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में हर त्योहार दो दिन का “पैकेज” बनकर रह जाएगा। इसी कारण कार्टूनिस्ट ने व्यंग्यात्मक अंदाज में यह सुझाव भी दिया है कि विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों की एक स्थायी समिति बनाई जानी चाहिए, जो पूरे देश के लिए अधिकृत रूप से त्योहारों की तिथियों की घोषणा करे। इससे अलग-अलग मतों के कारण पैदा होने वाली उलझन से आम लोगों को राहत मिल सकती है।

कार्टून सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना-

कार्टून सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कई लोगों का कहना है कि यह व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक गंभीर सामाजिक मुद्दे की ओर संकेत करता है, क्योंकि त्योहारों की तिथियों को लेकर होने वाला असमंजस अब लगभग हर साल देखने को मिलने लगा है।

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