छोटा परिवार से बड़ा जनाधार तक — 28 साल में बदली परिभाषा

जयपुर के कार्टूनिस्ट अशोक श्री श्रीमाल का व्यंग्य
भवानीमंडी । ( जगदीश पोरवाल )राजस्थान की सियासत में 28 साल बाद एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने पुराने नारे और नई जरूरतों के बीच दिलचस्प बहस छेड़ दी है। कभी जनता को समझाया गया था— “छोटा परिवार, सुखी परिवार”। लेकिन अब कैबिनेट के फैसले के बाद पंचायत और नगर पालिका चुनाव में दो से अधिक संतान वाले भी मैदान में उतर सकेंगे।

कार्टूनिस्ट अशोक श्री श्री माल ने इसी विरोधाभास पर तीखा व्यंग्य किया है। कार्टून में एक पात्र कहता है कि वह बात तो जनता के लिए थी, हमारे लिए तो “बड़ा परिवार, मजबूत जनाधार” है। यही एक पंक्ति पूरे राजनीतिक परिदृश्य का सार प्रस्तुत कर देती है।

दरअसल, लोकतंत्र में जनाधार ही असली पूंजी माना जाता है। पहले नियम था कि दो से अधिक संतान होने पर स्थानीय निकाय चुनाव नहीं लड़ सकते। तर्क यह था कि जनसंख्या नियंत्रण का संदेश ऊपर से नीचे तक एक समान होना चाहिए। मगर अब बदले फैसले ने यह संदेश दिया है कि राजनीति में समीकरण, सिद्धांतों से ज्यादा भारी पड़ते हैं।

व्यंग्य यहीं जन्म लेता है—

जब नीति जनता के लिए अनुशासन बने और राजनीति के लिए विकल्प।
कार्टून यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या नारे समय के साथ अपनी उपयोगिता खो देते हैं, या फिर वे सिर्फ दीवारों और पोस्टरों तक सीमित रह जाते हैं? 28 साल पहले जो आदर्श था, आज वह व्यवहारिक राजनीति के सामने हल्का पड़ता दिख रहा है।
लोकतंत्र में फैसले बदलते हैं, परिस्थितियां बदलती हैं, लेकिन कार्टून की ताकत यही है कि वह एक फ्रेम में पूरे घटनाक्रम का आईना दिखा देता है।
अशोक श्री श्री माल का यह कार्टून सिर्फ एक निर्णय पर टिप्पणी नहीं, बल्कि राजनीति के बदलते मानदंडों पर हल्की मुस्कान के साथ गहरा प्रश्नचिह्न है।

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