समस्या- मप्र के भैसोदामंडी और राज. के भवानीमंडी छात्रो की

दो राज्यों की सीमा पर फंसे सपने: 99.30% लाने वाला छात्र भी योजनाओं से वंचित

भवानीमंडी। (जगदीश पोरवाल)
राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसे जुड़वां कस्बे — राजस्थान का भवानीमंडी और मध्यप्रदेश का भैसोदामंडी। बीच में सिर्फ एक नाला, लेकिन नीतियों की खाई इतनी गहरी कि प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं के सपने उसमें गिरकर टूट रहे हैं।
भले ही दोनों कस्बों की बसावट, बाजार और सामाजिक जीवन एक जैसा हो, लेकिन सरकारी योजनाओं की बात आते ही ये दो दुनिया बन जाते हैं — और सबसे ज्यादा नुकसान उठा रहे हैं भैसोदामंडी के छात्र।

सीमा की सजा: न जन आधार, न मार्कशीट मान्य1

भैसोदामंडी के निवासी होने के कारण छात्रों को राजस्थान सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिलता, क्योंकि उनके पास जनाधार कार्ड नहीं है। वहीं मध्यप्रदेश सरकार लाभ इसलिए नहीं देती क्योंकि उन्होंने पढ़ाई राजस्थान में की है और दसवीं की मार्कशीट मध्यप्रदेश की नहीं है।

यानी छात्र राजस्थान में पढ़ें तो भी अपने नहीं, और मध्यप्रदेश में रहें तो भी पराए!

99.30% अंक लाने वाला छात्र भी निराश
हाल ही में JEE के परिणाम में भैसोदामंडी निवासी तनिष्क जैन ने 99.30 प्रतिशत अंक हासिल किए। इससे पहले कक्षा 10वीं बोर्ड में भी 93 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। इतनी शानदार उपलब्धि के बावजूद उसे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पाया।
तनिष्क के पिता पारस जैन ने बताया कि उन्होंने दोनों राज्यों में ऑनलाइन आवेदन किया, लेकिन दोनों जगह से आवेदन निरस्त कर दिया गया।
“मध्यप्रदेश से लाभ लेने के लिए दसवीं की मार्कशीट मांगी गई और राजस्थान से लाभ लेने के लिए जनाधार कार्ड। हमारा निवास मध्यप्रदेश में है, इसलिए राजस्थान का जनाधार बनना संभव नहीं। और पढ़ाई राजस्थान में की है, इसलिए मध्यप्रदेश में मार्कशीट मान्य नहीं। दोनों ओर से दरवाजे बंद हैं।”

90% लोगों का रोजगार भवानीमंडी से जुड़ा-

भैसोदामंडी के लगभग 90 प्रतिशत रहवासी रोजगार, व्यापार और शिक्षा के लिए भवानीमंडी पर निर्भर हैं। जमीन सस्ती होने के कारण वे भैसोदामंडी में बस गए, लेकिन अब उनके बच्चों को सीमा की इस विसंगति की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
दोनों कस्बों की सीमा के नाम पर मात्र एक नाला है, लेकिन प्रशासनिक सीमाएं बच्चों के भविष्य पर ताला लगा रही हैं।

सालों से जारी है समस्या, जनप्रतिनिधि मौन-

यह सिर्फ एक मामला नहीं, बल्कि वर्षों से सैकड़ों छात्र-छात्राएं इस दुविधा का शिकार हो रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के संज्ञान में मामला होने के बावजूद आज तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।
सवाल यह है…
क्या सीमा पर रहने वाले बच्चों की कोई पहचान नहीं?
क्या प्रतिभा राज्य की सीमा देखकर जन्म लेती है?
क्या दो राज्यों की नीतिगत खामियों के बीच भविष्य कुचलता रहेगा?
जब तक दोनों राज्य सरकारें समन्वय बनाकर विशेष प्रावधान नहीं करतीं, तब तक सीमा पर बसे इन होनहार छात्रों के सपने यूं ही कागजी शर्तों में उलझे रहेंगे।

  1. * ↩︎

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