जगदीश पोरवाल
देश में अर्थशास्त्र का एक नया और अनोखा नियम पिछले कुछ वर्षों से बड़ी ही मुस्तैदी से लागू है— “कच्चा माल महंगा हो तो दाम तुरंत बढ़ाओ, लेकिन कच्चा माल सस्ता हो जाए तो पुराना रेट ही नए जमाने का फैशन बताओ!”
हाल ही में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों के दामों में तेल कंपनियों ने राहत दी है। दो महीनों के भीतर 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर पर करीब 375.50 रुपये (पहली बार ₹183.50 और दूसरी बार ₹192) की भारी कटौती कर दी गई। खबर सुनते ही आम उपभोक्ता के चेहरे पर वही मुस्कान आई जो सदियों से बेवकूफ बनने वाले इंसान के चेहरे पर आती है। आम आदमी ने सोचा— “वाह! अब तो होटल, रेस्टोरेंट, समोसा, कचौरी, नमकीन और मिठाई सस्ती मिलेगी!”
लेकिन तभी दीवार पर बैठे एक अनुभवी कौए ने धीरे से कान में फुसफुसाया— “नादान… खुश मत हो! दाम कोई कम नहीं करेंगे अब!” कार्टूनिस्ट अशोक के आज के तीखे व्यंग्य चित्र ने आम जनता के इसी दर्द पर सटीक मोहर लगा दी है।
रॉ मटेरियल का गजब ‘वन-वे’ ट्रैफिक
होटल, रेस्टोरेंट, चाय-समोसे और नमकीन-मिठाई के कारोबार में अर्थशास्त्र के सारे वैश्विक सिद्धांत फेल हो जाते हैं। यहाँ केवल एक ही नियम चलता है:
यदि सिलेंडर 50 रुपये महंगा हुआ: तो चाय ₹10 की ₹12 होगी, समोसा ₹15 का ₹20 हो जाएगा, और कचौरी में दाल की जगह हवा का अनुपात बढ़ा दिया जाएगा। यानी रॉ मटेरियल में 2% की बढ़ोतरी पर अंतिम उत्पाद के दाम सीधे 10% से 25% तक छलांग मारते हैं।
यदि सिलेंडर 375 रुपये सस्ता हो गया: तो दुकानदार मासूमियत से मुस्कुराते हुए कहेगा— “भैया, गैस सस्ती हुई है तो क्या हुआ? तेल, मैदा और हमारी मेहनत तो उतनी ही लग रही है ना!” और अगर गलती से मैदा-तेल भी सस्ता हो जाए, तो जवाब मिलेगा— “अरे साहिब, भाड़ा और दुकान का किराया बढ़ गया है!”
यानी महंगाई की गाड़ी में ‘रिवर्स गियर’ होता ही नहीं है। दाम एक बार जो चढ़ गए, वे हिमालय की चोटी पर जाकर स्थायी झंडा गाड़ देते हैं।
जनता का सवाल: आखिर कब जागेगा ‘खाद्य विभाग’?
कमर्शियल सिलेंडर के दाम चाहे आज से दो साल पुराने स्तर पर आ जाएं, लेकिन आम उपभोक्ता की थाली और नाश्ते की प्लेट पर इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला। जब-जब कमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़ते हैं, व्यवसाई तुरंत रेट लिस्ट बदल देते हैं और उसका पूरा भार आम जनता की जेब पर डाल दिया जाता है। लेकिन गिरावट के वक्त इस बढ़ी हुई कीमत का फायदा पूरी तरह से विक्रेताओं की जेब में मुनाफा बनकर जमा हो जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि खाद्य विभाग और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की नजरें इन बेलगाम रेटों पर कब पड़ेंगी?
क्या राज्य और केंद्र सरकारों की जिम्मेदारी केवल सिलेंडर के दाम तय करने तक सीमित है?
क्या खाद्य पदार्थों से जुड़े व्यवसायों में मूल्य नियंत्रण (Price Control) और अनुचित लाभखोरी को रोकने का कोई नियम नहीं होना चाहिए?
अगर कच्चे माल (रॉ मटेरियल) की दरों में वृद्धि का आधार बनाकर दाम बढ़ाए जाते हैं, तो दरों में कमी आने पर उसका लाभ आम जनता तक पहुँचाना भी अनिवार्य किया जाना चाहिए। जब तक खाद्य विभाग इन बेलगाम भावों पर लगाम नहीं कसेगा, तब तक आम उपभोक्ता यूँ ही समाचार पत्र हाथ में लेकर कौए की बात पर मन मसोसकर रह जाएगा!
खाद्य विभाग की सुरती टूटना चाहिए
सिलेंडर ₹375 सस्ता हो गया, पर समोसा आज भी अपनी ₹20 की ज़िद पर अड़ा हुआ है। अब देखना यह है कि खाद्य विभाग की सुस्ती टूटती है या जनता को सस्ती कचौरी के सपने देखना ही छोड़ना पड़ेगा!

