झालावाड़ | 21 जुलाई:
झालावाड़ जिले के झालरापाटन स्थित गोमती सागर तालाब पर मंगलवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के चलते तालाब का जलस्तर अचानक खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। पानी के तेज बहाव के कारण किनारे पर मौजूद लगभग 30 लोग चारों तरफ से जलमग्न होकर फंस गए और मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
घटना की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन तुरंत हरकत में आया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपदा प्रबंधन तंत्र को अलर्ट मोड पर लाया गया और भारतीय सेना, NDRF व SDRF की टीमों को तत्काल मौके पर रवाना किया गया।
कुछ ही मिनटों में शुरू हुआ बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन
सूचना मिलते ही बचाव दलों ने बिना समय गंवाए घटनास्थल पर पहुंचकर मोर्चा संभाल लिया। जवानों ने मोटर बोट, लाइफ जैकेट, लाइफ बॉय और रेस्क्यू रोप जैसे आधुनिक लाइफ सेविंग उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए उफनते पानी के बीच फंसे लोगों तक पहुंच बनाई। जवानों ने अपनी त्वरित प्रतिक्रिया और दक्षता का परिचय देते हुए सभी 30 लोगों को एक-एक कर सुरक्षित बाहर निकाला।
तट पर स्थापित अस्थायी राहत शिविर में चिकित्सा विभाग की टीम ने घायलों का प्राथमिक उपचार किया, जबकि गंभीर रूप से घायल दर्शाए गए लोगों को एम्बुलेंस से अस्पताल पहुंचाया गया।
…लेकिन यह वास्तविक आपदा नहीं, तैयारियों का परीक्षण था!
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम कोई वास्तविक हादसा नहीं, बल्कि मानसून के दौरान अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी संभावित प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की तैयारियों को परखने के लिए आयोजित की गई एक व्यापक मॉक ड्रिल (अभ्यास) थी।
जिला प्रशासन और स्थानीय पुलिस के सहयोग से आयोजित इस संयुक्त अभ्यास में:
- भारतीय सेना: 81 जवान
- SDRF: 34 जवान
- NDRF: 31 जवान
कुल 146 प्रशिक्षित जवानों ने भाग लिया और वास्तविक आपदा जैसा माहौल बनाकर बचाव तकनीकों और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय का सजीव प्रदर्शन किया।
वरिष्ठ अधिकारी रहे मौजूद
इस अभ्यास का जायजा लेने के लिए भारतीय सेना के ब्रिगेडियर संजय रावत, कमांडिंग ऑफिसर रोहित ढोबाल, NDRF के सेकंड इन कमांड निशांत कुमार, SDRF कंपनी कमांडर एकता हाड़ा, पुलिस अधीक्षक अमित कुमार, जिला परिषद के सीईओ शंभु दयाल मीणा और उपखण्ड अधिकारी कमल सिंह यादव सहित कई अधिकारी मौके पर मौजूद रहे।
अधिकारियों ने बताया:
“आपदा से पहले तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव है। इस काल्पनिक परिदृश्य के जरिए विभिन्न एजेंसियों के रेस्पॉन्स टाइम (प्रतिक्रिया समय) और आपसी समन्वय का व्यावहारिक परीक्षण किया गया, ताकि वास्तविक आपदा के समय जन-धन के नुकसान को शून्य के स्तर पर लाया जा सके।”

